प्रशासन पूरे वाकये को तात्कालिक घटना से आगे बढ़कर देख रहा है। भागलपुर (प्रमंडल) के कमिश्नर राजेश कुमार का कहना है कि जुलूस तात्कालिक कारण हो सकता है। उन्होंने कहा कि प्रशासन देखने की कोशिश कर रहा है कि बस्तियों में क्या हिंदुओं और मुसलमानों के बीच भीतर ही भीतर कोई आक्रोश का मामला तो नहीं है जिसे शोभा यात्रा से हवा मिली। उनका कहना है कि अगर मामला जुलूस बनाम एक खास समुदाय का होता तो हालात ज्यादा गंभीर होते क्योंकि जुलूस में शामिल हिंसक भीड़ की मानसिकता बिना सोचे समझे काम करती है।
रामनवमी से एक महीना पहले शहर में भगवा क्रांति नाम के एक संगठन का जन्म हुआ। उसने रामनवमी के मौके पर विशाल कार्यक्रम का आयोजन किया और राम की विशाल मूर्ति भी बनवाई थी। भगवा क्रांति का प्रशासन से जुलूस निकालने को लेकर टकराव की भी स्थिति बनी। राजेश कुमार ने कहा कि ऐसे संगठनों पर तीखी नजर रखना बहुत ज़रूरी होता है। उन्होंने भगवा क्रांति के एक आमंत्रण पत्र को दिखाते हुए कहा कि वो इस कार्ड के प्रिंटर के नाम की तलाश करते रहे, लेकिन कहीं मिला नहीं।
सियासी जमीन
एक चीज यहां दिलचस्प दिखी कि अर्जित चौबे की शोभा यात्रा और उसके बाद फैले सांप्रदायिक तनाव को लेकर मुसलमान समुदाय खुलकर नाराजगी और आशंका जाहिर कर रहा है, लेकिन हिंदू समुदाय के लोग बात करने से बच रहे हैं। हिंदू पत्थरबाजी के बारे में तो बताते हैं, लेकिन किसकी गलती थी और शोभा यात्रा निकालना कितना सही था या गलत इस पर कोई भी टिप्पणी करने से बचते दिखे। बीजेपी के जिला अध्यक्ष रोहित पांडे का कहना है कि टकराव या तनाव की स्थिति शोभा यात्रा के दौरान नहीं बल्कि उसके बाद पैदा हुई है।
वहीं पर मौजूद बीजेपी के एक और नेता ने कहा कि नाथनगर में दोनों समुदायों के बीच पहले का ही कुछ मामला था और शोभा यात्रा बहाना बन गई। कई लोगों का मानना है कि अर्जित चौबे शहर में राजनीतिक जमीन को मुकम्मल करना चाहते हैं, इसलिए वो इन चीजों का सहारा ले रहे हैं। साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में अर्जित ने भागलपुर शहर से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा था, लेकिन कांग्रेस के अजित कुमार शर्मा से हार गए थे।
निहालुद्दीन 80 के दशक में बीजेपी में थे। निहालुद्दीन ने बीजेपी के टिकट पर महगामा विधानसभा सीट से चुनाव भी लड़ा था। महगामा अब झारखंड में है। अर्जित की शोभा यात्रा को लेकर निहालुद्दीन कहते हैं, "बीजेपी और अर्जित जैसे नेताओं के पास दो ही साबुन बचे हैं जिनसे नहाकर ये खुद को खरा बनाना चाहते हैं।" "ये साबुन हैं- मुसलमान और पाकिस्तान। पर इन्हें अब समझ लेना चाहिए कि हिंदू भी इनकी नफरत की राजनीति को समझ चुके हैं। ये 1989 नहीं है कि हिंदुओं को भड़का दिए और वो मुसलमानों के खिलाफ गोलबंद हो गए।"
भागलपुर (प्रमंडल) के कमिश्नर राजेश कुमार को लगता है कि शहर में ऐसे तनावों पर नियंत्रण पाना बहुत मुश्किल नहीं है, लेकिन गांवों में हुआ तो आसान नहीं होगा। राजेश कुमार कहते हैं कि ग्रामीण इलाकों की कुछ मस्जिदों से भागलपुर नहीं जाने का एलान किया गया था। उन्होंने कहा कि ऐसी घोषणाओं से अफवाहों को बल मिलता है। राजेश कुमार चाहते हैं कि ग्रामीण इलाकों में पनपने वाले सांप्रदायिक तनावों या अफवाहों पर कड़ी नजर रखी जाए।
'शोभा यात्रा' के बाद
शहर के अहमदनगर में रहने वाली मलका बेगम अर्जित चौबे की 'शोभा यात्रा' के बाद फैले सांप्रदायिक तनाव से डरी हुई हैं। अक्टूबर, 1989 में उनके चंधेरी गांव में दंगाइयों ने करीब 60 मुसलमानों को मार दिया था। मलका ने अपनी आंखों से माता-पिता की हत्या होते देखी थी। मलका को दंगाइयों ने मरा हुआ समझकर छोड़ दिया था। वो एक तालाब में दर्जनों लाशों के साथ घंटों रही थीं। ये सब कहते हुए मलका की आवाज फंस-सी जाती है। कुछ देर रुकती हैं और रोते हुए कहती हैं कि इंसानियत का जरा भी ख्याल है तो खुदा के लिए शहर में ऐसे जुलूस मत निकालो। वो कहती हैं, "मैं क्षत-विक्षत लाशों के बीच तालाब में रही हूं। अपने खून के साथ अपने लोगों के खून से तालाब का पानी लाल हो गया था। अब बस करो। अब नहीं।"