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बिहार में सभी दल बागी नेताओं से तंग

Sat, 29 Mar 2014 03:15 PM IST
आशीष झा/अमर उजाला, पटना
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बिहार में नेताओं के बगावती तेवर ने चुनाव की तस्वीर बदल दी है। पार्टी टिकट नहीं मिलने से बागी हुए नेताओं की कतार लंबी ही होती जा रही है। हाल यह है कि एक को मनाया जा रहा है, तो दूसरा बागी हो जा रहा है।
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बागियों में कई तो जनाधारहीन है, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो परिणाम बदलने की क्षमता रखते हैं। बागी नेता इस बार राजनीतिक दलों की पहली पसंद बन चुके हैं। सभी पार्टियां अपने तपे-तपाये नेताओं की जगह विरोधी पार्टियों के बागी नेताओं को अपना उम्मीदवार बना रही हैं।

आंकड़ों पर गौर करें तो इस बार अधिकतर बागियों को दूसरे दलों में जगह मिल गई है। सत्यनारायण यादव जैसे कुछ नेता जरूर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में हैं। टिकट को लेकर भाजपा में नाराज लोगों की सबसे लंबी कतार है।
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गिरिराज और अश्विनी चौबे की नाराजगी तो पार्टी ने दूर कर दी, लेकिन चंद्रमोहन राय जैसे पुराने और जनाधार वाले नेताओं को पार्टी समझाने में नाकामयाब रही। राय ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता को छोड़कर बाकी सभी पदों से त्यागपत्र दे दिया है। उन्होंने चुनावी राजनीति से ही संन्यास ले लिया है।

इस चुनाव में सबसे बड़ी बगावत राजद में ही हुई। लालू के सबसे करीबी माने जानेवाले रामकृपाल यादव ने पाटलिपुत्र सीट को लेकर बगावत कर दी। इतना ही नहीं वो भाजपा की ओर से लालू की बेटी मीसा से दो-दो हाथ करने को मैदान में आ गये हैं। वैसे राजद में नाराजगी मधुबनी की सीट को लेकर भी सामने आयी।

अब्दुलबारी सिद्दीकी ऐसे नाराज हुए कि लालू को कांग्रेस से गठबंधन की समीक्षा करनी पड़ी और मधुबनी सीट राजद के कोटे में लानी पड़ी। सत्यनारायण यादव भी राजद से टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय चुनाव में उतर आये हैं, जबकि रामबदन राय राजद से नाराज होकर सपा चले गये।

जदयू ने जहां सबसे अधिक पुराने सांसदों का टिकट काटा है, वहीं सबसे अधिक दूसरे दलों से आए नेताओं को टिकट दिया है। इस बात को लेकर पार्टी में बागी और नाराज नेताओं की लंबी कतार खड़ी हो गयी। जदयू में नरेंद्र सिंह, बृषिण पटेल और ज्ञानेंद्र ज्ञानू जैसे नेता अपनी नाराजगी सार्वजनिक कर चुके हैं, लेकिन वो पार्टी के साथ ही खड़े दिख रहे हैं। वैसे अन्नू शुक्ला टिकट नहीं मिलने से नाराज हैं और चुनाव मैदान में उतरने पर विचार कर रही हैं।

शिवानंद तिवारी जैसे नेता चुनावी मैदान में तो नहीं आये हैं, लेकिन उनकी जुबान ने जदयू को परेशान कर रखा है। साबिर ने तो बीजेपी का दामन थाम लिया है और शिवानंद भी नीतीश निंदा का पाठ पढ़ रहे हैं।
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