निसार साहब की उम्र 84 साल हो चुकी है। लेकिन मदद के लिए ये किसी नौजवान से ज्यादा फुर्तीले हो जाते हैं। वह बताते हैं कि लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करने की प्रेरणा उन्हें अपने पिता मो. हाफिज अब्दुल माजिद से मिली। उन्होंने 1958 में अंजुमन मोफीदुल इस्लामनामा संस्था की स्थापना की। इसका उद्घाटन उस समय के विधानसभा अध्यक्ष गुलाम सरवर ने किया था।
1967-68 में शहर के सुतूरखाना में एक समारोह में भोजन में जहर मिले होने की वजह से चार लोग मौत हो गई थी। इनका अंतिम संस्कार निसार ने ही किया था। बता दें कि निसार अहमद ने 1972 में पूरबसराय में नेशनल उर्दू गर्ल्स कॉलेज की स्थापना की। निसार ने औरंगजेब द्वारा बनवाई गई जामा मस्जिद के एक कोने में बैठकखाना बना रखा है, जहां पर किसी और की नहीं, बल्कि लावारिस शवों की तस्वीरें लगी हैं।
निसार की मानें तो एक शव के अंतिम संस्कार में दो से तीन हजार रुपये का खर्च आता है। इस राशि का इंतजाम वह चंदा और वृद्धा पेंशन से मिलने वाली रकम से यह काम करते हैं। गौरतलब है कि पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक इंटरव्यू के दौरान युवाओं को रोजगार देने के सवाल पर कहा था कि सरकारी नौकरी सभी को नहीं दी जा सकती है, लोग चाय- पकौड़े की दुकान चलाकर भी पैसा कमा सकते हैं।