मैं राजस्थान में हनुमानगढ़ जिले की नोहर तहसील स्थित फेफाना गांव का रहने वाला हूं। पिछले करीब एक दशक से मैंने पौधों को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है। दरअसल हमारी आज की अनेक परेशानियों की वजह वनस्पतियों की उपेक्षा भी है। पेड़-पौधों की कटान से भू-जल कम होता चला गया, बाढ़ का प्रकोप भयावह होने लगा और वर्षा कम होने लगी। पर्यावरण प्रदूषण की बड़ी वजह भी वनस्पतियों का अभाव होना ही है। चूंकि मैं अध्यापन के पेशे से जुड़ा हूं, इसलिए मैंने लंबे समय तक इस पर विचार किया कि यह स्थिति कैसे बदली जा सकती है। अंत में मेरे सामने जो समाधान आया, वह यही कि पौधरोपण को हमारी सोच और संस्कृति का हिस्सा बना दिया जाए। इसके लिए मैंने खुद ही पहल की। जैसे, मैं हर आदमी को अपने यहां पौधे लगाने और उनकी देखभाल करने के लिए कहता हूं। इसका असर दिखने लगा है।
हमारे यहां शादियों के समय अग्नि के सात फेरे लेते हुए पति-पत्नी सात वचन लेते हैं। मैंने पौधे को हमारी संस्कृति का हिस्सा बनाने के लिए शादी के सात वचनों में एक और हरित वचन जोड़ दिया। यानी मैं शादियों में वर-वधू से यह प्रतिज्ञा करवाता हूं कि वे हर साल एक पौधा लगाएंगे और उनकी देखभाल भी करेंगे। लोगों ने मेरे इस विचार को उत्साह के साथ ग्रहण किया है। शादी से जुड़ी हर विधि में पौधरोपण को शामिल कर लिया गया है। एक आदमी औपचारिक आयोजन में बीस पौधे लगाए और कुछ महीने बाद वे सूख जाएं, तो ऐसे पौधरोपण का कोई महत्व नहीं होता। मैंने इन पौधरोपण समारोहों की निरर्थकता को बहुत नजदीक से देखा है। इसलिए मैंने यह रास्ता अपनाया। इससे एक आदमी पर पौधे रोपने का बोझ नहीं पड़ेगा और शादी-ब्याह में पौधरोपण से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में यह परंपरा का भी रूप ले लेगा।
मैंने यह भी तय कर दिया है कि नए वर-वधू पौधरोपण स्कूल-कॉलेज जैसी सार्वजनिक जगहों पर करेंगे। ऐसा होने लगा है। इससे एक और लाभ यह है कि छात्रों के समूहों को पौधरोपण के महत्व के बारे में पता चलता है। हमारे यहां शादी के दौरान कंकड़ पूजा का रिवाज है, जिसमें नई दुल्हन गांव के प्रवेश द्वार पर लगे पेड़ के नीचे नारियल फोड़कर पेड़ का आशीर्वाद लेती है। मैंने इस आयोजन में भी पौधरोपण को शामिल करवा दिया है। इसका लाभ यह है कि गांव में पेड़-पौधे पनपते रहेंगे और हरियाली सदा बनी रहेगी। शादियों में शामिल होने वाले सभी अतिथियों को भोजन के बाद फलदार वृक्ष के पौधे भेंट करने की परंपरा भी हमारे यहां शुरू की गई है। नतीजा लोगों को भी पौधों का महत्व पता चल रहा है।
मैं रोज मिलने वाले लोगों और छात्रों को पौधरोपण का महत्व तो बताता ही हूं, उनसे रोपे गए पौधों की देखभाल के लिए भी कहता हूं, क्योंकि पौधरोपण को औपचारिक बना देने का कोई लाभ नहीं होगा। मैं इस पर भी बल देता हूं कि सिर्फ फलदार वृक्षों के पौधे ही रोपे जाएं। इससे हरियाली बढ़ेगी और लोगों को पोषण भी मिलेगा। मेरे पौधरोपण अभियान को महत्व मिला है, तो इसकी एक वजह यह भी है। मैं दिवाली के समय पौधरोपण करता हूं और अपनी नानी की मौत पर भी अपने गांव में मैंने पौधरोपण किया था। मेरे इस अभियान के तहत राजस्थान के सूखे इलाकों के करीब ढाई हजार गांवों में करीब सवा छह लाख पौधे लगाए गए हैं। अपने इस काम के लिए मुझे राष्ट्रपति पुरस्कार मिल चुका है, पर मैं इस अभियान को राष्ट्रीय स्वरूप देना चाहता हूं।