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पशु और निर्धन बच्चों के लिए जीवन किया समर्पित

Tue, 08 Mar 2016 12:57 PM IST
गौरव मिश्रा/ अमर उजाला, देहरादून
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न‌मिता नारायण - फोटो : amar ujala
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बेहद संपन्न और प्रतिष्ठित राजस्थानी मारवाड़ी परिवार से संबंध रखने वाली नमिता नारायण ने लकीर का फकीर बनना कभी स्वीकार नहीं किया।
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सत्तर वर्ष की हो चुकी हैं लेकिन अभी भी विद्रोही तेवर बरकरार हैं। अध्यात्म व भारतीयता उनके रग रग में समाया हुआ है लेकिन पोगापंथ, धार्मिक संकीर्णता, संकुचित व सामंती सोच के खिलाफ वह बचपन से ही जंग करती आई हैं।

महान कवि, लेखक, चिकित्साशास्त्री व वित्त मामलों में देश में यश प्राप्त करने वाले बाल कृष्ण कोठारी नारायण की बेटी नमिता ने जो ठाना वह करके दम लिया। कानून में डाक्टरेट व कई विषयों में स्नातकोत्तर की पढ़ाई करने के बाद भी पेशेवर नहीं बनीं। गरीब बच्चों की शिक्षा व पशुओं के उन्नयन विशेषकर गायों की सेवा के लिए जीवन समर्पित कर दिया।
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बड़े से बड़े प्रलोभनों से मुंह मोड़ लिया। यहां तक की विवाह कर घर भी नहीं बसाया। गरीबों के बच्चों की जिंदगी में समानता के अवसरों की कमी से पीड़ित होकर उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में कुछ बड़ा करने की ठानी। सत्तर के दशक में कुछ एक स्कूल खोले।

दो दशकों तक वे अच्छी तरह संचालित भी हुए। लेकिन बाद में स्वास्थ्य खराब होने व कुप्रबंधन के कारण इनको बंद करना पड़ा। लेकिन दूसरी तरह से निर्धन बच्चों की जिंदगी में रोशनी लाने में जुटी रहती हैं। साल 1980 में इन्होंने घर में ही गोशाला खोली वह आज तक कायम है। बीमारी और वृद्धावस्था पर भी गऊ की मन से सेवा करती हैं।

अब तक सैकड़ों गायों का लालन पालन कर चुकी हैं। पशु अधिकारों पर कई स्तरों पर बड़ी लड़ाइयां लड़ चुकी हैं। कहती हैं कि गाय पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। पशु पक्षियों के अधिकारों की रक्षा होनी चाहिए। लेकिन इसमें धर्म का घालमेल गलत है। इसको सिर्फ और सिर्फ पशु अधिकारों व संवेदनशीलता से जोड़ा जाना चाहिए।

महादेव शंकर की परम उपासक नमिता नारायण कहती हैं अगर संसार में शुभ को कायम रखना है तो सच्चे लोगों को नीलकंठ की संस्कृति को अपनाना ही होगा। खुद कष्ट पाकर, विष पीकर संसार को सुंदर बनाना होगा।

चाय बागान मजदूरों, गरीब बच्चों के लिए संघर्षरत
बचपन से ही कम्युनिस्ट संस्कारों में पली बढ़ी चित्रा गुप्ता ने तय कर लिया था कि वह सामान्य जीवन नहीं जीएंगी। नामी दिग्गज कम्युनिस्ट नेता बृजेंद्र गुप्ता व बाला गुप्ता की बेटी होने के नाते उन्होंने अपने मां व पिता को अनगिनत मर्त बाजेल जाते हुए देखा। मजदूरों व किसानों की गुरबत से भरी जिंदगी देखी। पिता और मां चाय बागान मजदूरों के लिए संघर्ष के साथ ही रचनात्मक काम भी करते थे। बहुत करीब से चित्रा ने महिला मजदूरों की बेबस और दयनीय जिंदगी को देखा।

तब से उनके मन में कमजोर वर्ग के लिए कुछ कर गुजरने की तीव्र इच्छा पैदा हुई जिसने हिमालय सरीखे संकल्प का रूप ले लिया। ऊंची से ऊंची शिक्षा हासिल की। एमएससी, पीएचडी तक तालीम हासिल की। कैंब्रियन हॉल में डेढ़ दशक तक शिक्षा प्रदान की।

लेकिन मन नहीं रमा। वामपंथी जीवन में जैसे ढल गई थी। चाय बागान मजदूरों के लिए रचनात्मक काम करने लगी। 1983 में बिंदाल पुल के पास बेहद निर्धन बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। चाय बागान मजदूरों के बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के लिए भीरचनात्मक अभियान शुरू किया।
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चतुरानन मिश्रा, इंदरजीत गुप्ता, पीसी जोशी जैसे दिग्गजों के जीवन से प्रभावित होकर अविवाहित रहकर समाज सेवा करने का फैसला लिया। तब से अब तक संघर्ष और रचना में जिंदगी खपा दिया। चार दशकों से चाय बागान मजदूर सभा की निर्विवाद नेता हैं। बच्चों के लिए स्कूल चलाती हैं। तमाम रचनात्मक कार्यक्रम चलाती हैं। चाय बागान को बचाने में वह एक जुझारू योद्धा के तौर पर सामने आईं हैं।
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