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जंगल की बड़ी मां बनकर लोगों का इलाज करती हूं

Wed, 07 Feb 2018 03:13 PM IST
संपादकीय डेस्क, अमर उजाला
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लक्ष्मीकुट्टी
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पचास के दशक में मैं अपने इलाके की इकलौती लड़की थी, जो स्कूल जाती थी। मुझे आज भी यह सोचकर हैरानी होती है कि उस दौर में मैंने कैसे अपने पिता को मनाया होगा। मुझे याद है कि मैं दो लड़कों के साथ हर रोज करीब दस किलोमीटर दूर चल कर स्कूल जाती थी। इसके बावजूद मैं केवल आठवीं तक ही पढ़ सकी, लेकिन शिक्षा के अल्प अवसर मेरी ज्ञानर्जन प्रक्रिया को प्रभावित नहीं कर सके। मेरी मां पेशे से एक दाई थीं। 
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पारंपरिक और प्राकृतिक औषधियों की जानकारी विरासत में मुझे अपनी मां से मिली। सोलह साल की उम्र में मेरी शादी उसी लड़के से हुई, जो मेरे साथ स्कूल जाने वाले दो लड़कों में शामिल था। मेरे पति ने, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, जिंदगी के हर मोड़ पर मेरा साथ दिया। मगर जिंदगी ने कई मौकों पर हमारा इम्तिहान लिया। मेरा बड़ा बेटा जंगली हाथियों का शिकार बना, तो अन्य बेटे की भी जंगली दुर्घटना में मौत हुई। इन त्रासद घटनाओं के बावजूद जंगल से मेरा लगाव कम नहीं हुआ। मेरा एक तीसरा बेटा भी है, जो रेलवे में काम करता है।

मैं केरल के कल्लार के जंगलों के बीच एक गांव में रहती हूं। दुनिया मुझे आदिवासियों की श्रेणी में रखती है। प्राकृतिक चिकित्सा के बारे में जानकारी के साथ मैं शिक्षिका और कवयित्री भी हूं। अपनी स्मरण शक्ति से ही मैं पांच सौ से अधिक औषधियां तैयार कर सकती हूं। आज तक मैं उन्हें भूली नहीं हूं। मेरी झोपड़ी के इर्द-गिर्द विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूटियां लगी हुई हैं। दूर-दूर से सैकड़ों लोग मेरे पास इलाज के लिए आते हैं, जिनमें अधिकांश की संख्या कीड़े-मकोड़ों द्वारा काटे या सांप से डसे लोगों की होती है। 
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बहुत से लोग मुझे प्यार से वनमुतशी बुलाते हैं, जिसका मलयालयी अर्थ है- जंगल की बड़ी मां। साल 1995 में जब मुझे केरल सरकार ने नेचुरोपैथी अवॉर्ड से सम्मानित किया, तो जंगल से बाहर की दुनिया को मेरे बारे में पता चला। ऐसा नहीं है कि मैं पारंपरिक चिकित्सा का अभ्यास बिना किसी प्रयोग के मात्र मान्यताओं के आधार पर करती हूं। मैं अपने ज्ञान को विभिन्न माध्यमों से निरंतर परखती रहती हूं। 
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इसके अलावा मैं अपनी जानकारी शोधकर्ताओं, छात्रों और वनस्पति विज्ञान में रुचि रखने वालों के बीच निःशुल्क बांटती रहती हूं। जंगल के पेड़, फूल, फल और पेड़ की छालों का इस्तेमाल कर प्राकृतिक दवा बनाने के साथ ही मैं कविता लिखती हूं, विभिन्न संस्थानों में नैचुरल मेडिसिन पर लेक्चर देती हूं तथा कल्लार के केरल फोल्कलोर एकेडमी की नियमित शिक्षिका हूं।

मुझे बहुत खुशी है कि जंगल में रहकर पेड़-पौधों का इस्तेमाल कर औषधि बनाने वाली मुझ जैसी सामान्य महिला को सरकार ने पद्मश्री जैसे इतने बड़े सम्मान के काबिल समझा।
आजकल हर तरफ जंगल और पेड़ नष्ट किए जा रहे हैं। 

मैं चाहती हूं कि सरकार इस ओर भी ध्यान दे, शोध की मदद से हम कई बीमारियों का इलाज इन्हीं पेड़-पौधों से निकाल सकते हैं। लेकिन हमें अपने जंगलों को बचाना होगा। मेरी उम्र पचहत्तर पार हो चली है। मुझे याद है कि 1952 में मंजूरी मिलने के बावजूद मेरे घर के पास की सड़क आज तक नहीं बन सकी है। मुझे उम्मीद है कि अब इस सम्मान के बहाने ही सही, वह सड़क अवश्य बन जाएगी।

-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित
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