पचास के दशक में मैं अपने इलाके की इकलौती लड़की थी, जो स्कूल जाती थी। मुझे आज भी यह सोचकर हैरानी होती है कि उस दौर में मैंने कैसे अपने पिता को मनाया होगा। मुझे याद है कि मैं दो लड़कों के साथ हर रोज करीब दस किलोमीटर दूर चल कर स्कूल जाती थी। इसके बावजूद मैं केवल आठवीं तक ही पढ़ सकी, लेकिन शिक्षा के अल्प अवसर मेरी ज्ञानर्जन प्रक्रिया को प्रभावित नहीं कर सके। मेरी मां पेशे से एक दाई थीं।
पारंपरिक और प्राकृतिक औषधियों की जानकारी विरासत में मुझे अपनी मां से मिली। सोलह साल की उम्र में मेरी शादी उसी लड़के से हुई, जो मेरे साथ स्कूल जाने वाले दो लड़कों में शामिल था। मेरे पति ने, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, जिंदगी के हर मोड़ पर मेरा साथ दिया। मगर जिंदगी ने कई मौकों पर हमारा इम्तिहान लिया। मेरा बड़ा बेटा जंगली हाथियों का शिकार बना, तो अन्य बेटे की भी जंगली दुर्घटना में मौत हुई। इन त्रासद घटनाओं के बावजूद जंगल से मेरा लगाव कम नहीं हुआ। मेरा एक तीसरा बेटा भी है, जो रेलवे में काम करता है।
मैं केरल के कल्लार के जंगलों के बीच एक गांव में रहती हूं। दुनिया मुझे आदिवासियों की श्रेणी में रखती है। प्राकृतिक चिकित्सा के बारे में जानकारी के साथ मैं शिक्षिका और कवयित्री भी हूं। अपनी स्मरण शक्ति से ही मैं पांच सौ से अधिक औषधियां तैयार कर सकती हूं। आज तक मैं उन्हें भूली नहीं हूं। मेरी झोपड़ी के इर्द-गिर्द विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूटियां लगी हुई हैं। दूर-दूर से सैकड़ों लोग मेरे पास इलाज के लिए आते हैं, जिनमें अधिकांश की संख्या कीड़े-मकोड़ों द्वारा काटे या सांप से डसे लोगों की होती है।
बहुत से लोग मुझे प्यार से वनमुतशी बुलाते हैं, जिसका मलयालयी अर्थ है- जंगल की बड़ी मां। साल 1995 में जब मुझे केरल सरकार ने नेचुरोपैथी अवॉर्ड से सम्मानित किया, तो जंगल से बाहर की दुनिया को मेरे बारे में पता चला। ऐसा नहीं है कि मैं पारंपरिक चिकित्सा का अभ्यास बिना किसी प्रयोग के मात्र मान्यताओं के आधार पर करती हूं। मैं अपने ज्ञान को विभिन्न माध्यमों से निरंतर परखती रहती हूं।