बिजबिहाड़ा निवासी जावेद टाक के रिश्तेदारों के घर पर 21 मार्च 1997 की रात को आतंकियों ने अंधाधुंध गोलियां बरसाई थीं। जावेद टाक तब वहीं थे। इस दौरान वह गंभीर रूप से घायल हो गए। तकरीबन एक साल तक अस्पताल में रहने के बाद अस्पताल से छुट्टी के बाद घर पहुंचे। इसके बाद 1999 से 2000 जावेद वह बीमार रहे। इस बीच वर्ष 2000 में ही संकल्प लिया कि अब वह गरीब बच्चों को पढ़ाएंगे।
वर्ष 2005 में उन्होंने मन बनाया कि वह देखेंगे कि जिले में और कितने विकलांग हैं। इस दौरान 37 लोग ऐसे मिले। उनके साथ उन्होंने बातचीत की। इसके बाद 2007 में एक स्कूल खोला, जो निजी इमारत में संचालित हुई। उन दिनों इंडियन नेवी के चीफ सुरेश मेहता कश्मीर के दौरे पर थे। उस दौरान उन्होंने स्कूल के लिए एक एंबुलेंस दी, जो 26 सीटों वाली थी।
स्कूल में 113 बच्चे पढ़ने आते थे। इनमें 62 बच्चे नियमित स्कूल आते थे। टाक ने स्कूल का नाम जेबा आपा इंस्टीट्यूट रखा। जावेद टाक ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब मन की बात कार्यक्रम में स्कूल का जिक्र तो उन्होंने खुशी मिली। लेकिन, मन की बात मन में ही रही। कोई भी मदद स्कूल को अभी तक नहीं मिली। हालांकि उन्होंने उम्मीद जताई कि उन्हें सपोर्ट मिलेगा।
टाक के अनुसार उन्हें अभी तक कई पुरस्कार मिल चुके हैं। इनमें नेशनल अवार्ड फार वेलफेयर आफ डिस्एबल पर्सन 2004 शामिल है। 2010 में स्टेट अवार्ड फार डिफार्म्स एंड एंपावरमेंट मिला। 2009 सिटीजन जर्नलिस्ट अवार्ड भी मिला।
जावेद टाक का कहना है कि मै विकलांगों के लिए आखिरी दम तक लड़ूंगा। जो भी समस्याएं आती हैं, उनके साथ खड़ा रहता हूं। उनका कहना है कि उन्हें तब खुशी मिलती है, जब वह उन विकलांगों को देखते हैं, जो कभी बोल नहीं पाते थे। अब वह खुद अपना काम करते हैं। हालांकि अभी बहुत कुछ करना है। इसमें राज्य और केंद्र सरकार से मदद की अपील की है।