जिस दुनिया में जीते जी अपने मुंह मोड़ लेते हों, वहां किसी शख्स को अनजानों का आखिरी सफर सुकून भरा बनाने का जज्बा हो तो अचंभा होता ही है। कठुआ के केवल सुंबडिया अब तक 537 लावारिस लाशों का उनके धर्म के मुताबिक अंतिम संस्कार कर चुके हैं। अब तो आलम यह है, जहां भी कोई लावारिस लाश मिलती है, पुलिस और प्रशासन को वह ही याद आ जाते हैं।
उन्हें ऐसा करने से आत्मिक शांति मिलती है। जिला अस्पताल कठुआ में अकसर ऐसे शव पहुंचते हैं, जिनकी शिनाख्त नहीं हो पाती है। इसके अलावा कई शवों की हालत सड़ने और गलने के कारण इतनी खराब हो जाती है कि उनसे उठने वाली बदबू भी असहनीय होती है।
इस बदबू के चलते शव के निकट जाना तो दूर, कोई एक नजर देखना भी जरूरी नही समझता, लेकिन कठुआ में केवल की बदौलत ऐसे शवों की बेकद्री नहीं होती। वह मृतक के धर्म के मुताबिक पूरी परंपरा से उसकी अंतिम क्रिया करते हैं।
पेशे से नाई का काम करने वाले केवल सुंबडिया बिना किसी लोभ या लालसा के पार्थिव इंसानी शरीर को उस समय थामने के लिए भनक लगते ही हाजिर हो जाते हैं, जब उसके अंतिम संस्कार के लिए एक अदद इंसान की कमी पड़ जाती है।
लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करवाने में कई चुनौतियों का सामना करने वाले केवल के पास इस सेवा का एक ही जवाब है कि लावारिस शवों को यदि इस घड़ी में सम्मान मिल जाए तो मन को एक अजीब सी संतुष्टि मिलती है। भरे पूरे परिवार के मुखिया केवल बताते हैं कि जम्मू में नाई का काम सीखते समय उन्होंने इसी तरह से एक व्यक्ति को सेवा करते देखा, जिससे वह प्रभावित हुए।
उस समय उनकी उम्र मात्र बारह साल थी। 1965 से लेकर आज तक वह कठुआ में पहुंचने वाले हर लावारिस शव का उसकी परंपरा के मुताबिक अंतिम संस्कार करते आ रहे हैं। हिंदू को पंचतत्व में विलीन किया जाता है और मुस्लिम को उसके मजहब के अनुसार दफनाया जाता है।
इस काम को कई लोगों ने अटपटा भी ठहराया, नापसंद भी किया, लेकिन आज तक केवल के इस प्रयास की कड़ी टूटने के बजाय और भी पक्की होती गई। बीते सप्ताह उन्होंने 537वें लावारिस शव का अंतिम संस्कार कराया। इस अनोखे प्रयास के बारे में केवल बताते हैं कि उनकी प्रेरणा से प्रभावित होकर शहर के कुछ लोग गुमनामी में भी उनकी मदद के लिए आगे आते हैं।
हालांकि अब तो प्रशासन भी अंतिम संस्कार के लिए 500 रुपये देता है, लेकिन एक शव का संस्कार करने के लिए लगभग 3500 रुपये लग जाते हैं। जैसे-तैसे सामान जुटाकर काम को पूरा करते हैं। 66 साल के केवल कहते हैं कि उनके जीवन की कड़ी कब टूट जाए, कोई ठिकाना नहीं। पता नहीं मेरे शव का अंतिम संस्कार करने कोई आएगा भी या नहीं, लेकिन पांच सौ से अधिक लोगों के शवों का संस्कार करने के बाद उन्हें जीवन में आत्म संतुष्टि का अनुभव जरूर हासिल हुआ है।