लखनऊ में खदरा के पास मदेयगंज की संकरी गलियों में आपको कई बार नाक पर रूमाल रखने पड़ते हैं और पैर संभालकर रखना होता है क्योंकि दोनो ओर बजबजाती नालियां हैं।
चिकन के एक मशहूर कलाकार की कला ऐसी ही तंग इलाकों और परेशानियों के बीच परवान चढ़ी है। मदेयगंज में अयूब खान का घर ढूंढना मुश्किल नहीं हैं। घरों के बाहर चिकन का काम करती महिलाएं बड़े आदर के साथ उनका पता बताती हैं और अयूब खान ने अपने घर के दरवाजे पर शिल्पगुरु सम्मान के प्रशस्तिपत्र की छायाप्रति चिपका रखी है।
उनसे मिलने पर वे टटोलते हुए आपका हाथ थामते हैं और बताते हैं कि डेढ़-दो साल पहले दूसरे आंख की रोशनी भी चली गई। चिकन के इस विख्यात कलाकार ने अपनी कला के लिए कई पुरस्कार पाए हैं लेकिन पहले दाई आंख गंवाई और अब पूरी तरह अंधे हो चुके हैं।
उनके पिता फैयाज खान, जिन्हें 1965 में राष्ट्रपति पुरस्कार मिला था और जिनके चिकन के कई नमूने संग्रहालयों में संग्रहीत हैं, ने भी अपनी आंखें गंवा दी थी और यही कारण है कि अयूब खान की आगे की पीढिय़ां अब इस कला से दूर हो चुकी हैं।