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'सबसे जुदा, सबसे अलग है लखनऊ शहर की पहचान व शान'

Mon, 05 Dec 2016 12:03 AM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
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अतुल तिवारी - फोटो : amar ujala
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मैं दुनिया के कई देशों में घूमा। अक्सर लोग मुझसे सवाल करते हैं कि आप कहां से हैं? जब मैं बताता कि मैं लखनऊ से तो प्रतिक्रिया होती है कि आपका हाव-भाव, आपके बोलने के अंदाज को देखकर ऐसा ही लग रहा था। दरअसल यह यूं ही नहीं कहा गया कि लखनऊ का अंदाज सबसे जुदा है। यह महज किताबी बातें नहीं, बल्कि सच है कि अपना शहर सबसे जुदा और सबसे अलग है। यह कहना है बॉलीवुड में बतौर एक्टर व स्क्रिप्ट राइटर अपनी पहचान रखने वाले लखनऊ के अतुल तिवारी का।
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कहीं रहूं, रूह यहीं बसती है
वह कहते हैं कि खुशनसीब मानता हूं खुद को कि शान-ए-अवध में मेरी पैदाइश हुई। पढ़ाई के लिए कुछ समय शहर से दूर रहा। फिर कॅरियर की जद्दोजहद के कारण बाहर रहना पड़ा, लेकिन रूह यहीं बसती है। आज भी मौका मिलते ही लखनऊ का रुख करता हूं। हुसैनगंज में हमारा मकान है।

नहीं भूलता वह 'स्ट्रीट प्ले'
लखनऊ से हजारों यादें जुड़ी हैं। एक किस्सा आपसे शेयर करता हूं। बात इमरजेंसी के दौर की है। चूंकि हमारा परिवार राजनीतिक रसूख रखता था, इसलिए मैं भी बेखौफ युवा था। इमरजेंसी लागू हो चुकी थी। इस दौरान सड़क पर निकला और पुलिसकर्मी से भिड़ गया था। पुलिस ने हथकड़ी लगाई और लेकर चलती बनी।
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वहीं अपने-अपने घरों के दरवाजे पर खड़े मेरे दोस्तों की नजर मुझ पर पड़ी तो वे हंसने लगे। किसी ने भी मुझे उनसे छुड़ाने की कोशिश नहीं की। खैर, बाद में मैंने नाराजगी जताते हुए जब उनसे कहा कि तुम लोग कैसे दोस्त हो, कोई मुझे छुड़ाने नहीं आया। वे बोले- अरे! हमने तो समझा की तुम किसी स्ट्रीट प्ले की रिहर्सल कर रहे है। मैं अवाक और फिर सभी हंस पड़े।

पड़ोसी भी फिक्रमंद रहते थे
पिताजी सीपीएम में जनरल सेक्रेटरी थे। इमरजेंसी के दौरान हमारे घर पर विशेष तौर पर पहरा बैठा था। वह दौर हमें याद है कि हमारे घर की तलाशी होती। छोटे-छोटे सामानों की रसीद मांगी जाती। एक दिन तो हमारे यहां के फर्नीचर की रसीद मांगी जाने लगी। हम क्या हमारे पड़ोसी भी यह सुन परेशान हो उठे, भला इतने पुराने सामानों की रसीद कौन रखता है। खैर, परेशानी भले ही किसी के घर आए, लेकिन आसपड़ोस के लोग भी फिक्रमंद रहते थे। आज अपार्टमेंट कल्चर के दौर में कहां किसी को किसी की फिक्र होती है।

छेडख़ानी की भी एक मर्यादा थी
युवावस्था में फ्लर्ट न किया तो क्या किया, लेकिन हमारे दौर में यह भी मर्यादित थी। अक्सर चाय-पान की दुकान पर खड़े होकर लड़कियां देखना आम बात थी, लेकिन मेरी नजर में वह एक प्रकार का 'हेल्दी मॉलस्टेशन' था। यह तो बात हुई शहर के युवाओं की, जिनसे हमारी दिनचर्या कुछ अलग थी। मसलन शुरू से ही ड्रामेबाजी का शौक होने के कारण हमारा समय तो नाटकों की रिहर्सल में बीतता। फिर हमारे गुरु ठहरे राज बिसारिया जी। अनुशासन जिनके लिए पहली प्राथमिकता थी। फिर उनसे सीखते-सीखते कई शामें बीत गईं। कभी गंजिंग की आदत लगी ही नहीं।

बदलाव तो होंगे ही
जब हम बात करते हैं लखनऊ में आ रहे बदलावों की तो यह स्वाभाविक है। लखनऊ की भौगोलिक संरचना बहुत बदल चुकी है और मैं तो यह कहूंगा कि समय के साथ यह जरूरी भी है। अलीगंज, गोमतीनगर में पहले जंगल हुआ करते थे, अब शहर के पॉश इलाके हैं ये।

हां, मिजाज नहीं बदलना चाहिए लेकिन थोड़ा-बहुत परिवर्तन इसमें भी आ चुका है। हालांकि यह लोगों की मजबूरी भी है। दौड़भाग इतनी बढ़ चुकी है कि अब बिना वजह कोई एक दूसरे से नहीं मिलता। कोई किसी से बात भी करता है तो उसके पीछे एक कारण होता है। पहले था कि समोसा खाने के बहाने ही मिल लिया करते थे, लेकिन अब जब तक काम नहीं होगा बात तक नहीं होती।
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