यात्री सुविधाओं के लिए जरूरी है एग्रीगेटर सिस्टम
उबर ने जोर देकर कहा कि शहरों में जहां ट्रैफिक भारी रहता है, वहां 'लास्ट माइल कनेक्टिविटी' के लिए बाइक टैक्सी सेवाएं बेहद अहम हैं। और जब अकेले लोग अपनी बाइक से टैक्सी सेवा दे सकते हैं, तो उन्हें जोड़ने वाले प्लेटफॉर्म्स को रोकना उपभोक्ता के हित में नहीं है। उबर ने तर्क दिया, "अगर बाइक टैक्सी वैध है, तो उसे संगठित करने वाले प्लेटफॉर्म पर रोक लगाने का कोई तुक नहीं बनता।"
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उबर ने बताया सरकार का दोहरापन
उबर ने राज्य सरकार की अब बंद हो चुकी ई-बाइक नीति का हवाला देते हुए कहा कि कभी सरकार ने खुद इलेक्ट्रिक बाइक के एग्रीगेशन को मंजूरी दी थी। इसका मतलब है कि ऐसे प्लेटफॉर्म्स को अनुमति देना कानून के खिलाफ नहीं है। राघवन ने कहा, "ई-बाइक स्कीम को वापस लेना, पूरे सिस्टम को ही अवैध नहीं बना देता।"
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बैन का कोई ठोस सरकारी आदेश भी नहीं
उबर ने यह भी दावा किया कि सरकार ने बाइक टैक्सी को लेकर कोई स्पष्ट नीति बनाई ही नहीं है। वे केवल एक कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर बैन लागू कर रहे हैं, जबकि साल 2019 में सरकार ने खुद विशेषज्ञों की एक रिपोर्ट को खारिज कर दिया था, जिसमें बाइक टैक्सी को रेगुलेट करने की सिफारिश थी, न कि सीधा बैन करने की।
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क्या है मूल सवाल
उबर ने इस केस में एक बड़े सवाल को उठाया है। जब किसी व्यक्ति को अपने स्तर पर बाइक टैक्सी चलाने की अनुमति है, तो उसी काम को संगठित और डिजिटल तरीके से करने वाले प्लेटफॉर्म्स पर रोक कैसे लगाई जा सकती है? उबर का कहना है कि ऐसा करना नवाचार (इनोवेशन) को रोकना और शहरी परिवहन की समस्याओं का हल निकालने की कोशिशों को दबाना है।
अब इस मामले में अगली सुनवाई पर कर्नाटक सरकार अपनी दलीलें कोर्ट के सामने रखेगी। देखना दिलचस्प होगा कि अदालत किसके पक्ष में फैसला देती है - सरकार या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स।
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