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Uber: बाइक टैक्सी चल सकती हैं, तो एग्रीगेटर्स क्यों नहीं? उबर ने कर्नाटक के फैसले को कोर्ट में दी चुनौती

Fri, 11 Jul 2025 07:21 PM IST
अमर शर्मा ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

कर्नाटक में बाइक टैक्सी एग्रीगेटर्स पर लगाए गए बैन को लेकर उबर इंडिया ने हाई कोर्ट में खुलकर विरोध दर्ज कराया है। उबर का कहना है कि सरकार का यह फैसला न सिर्फ कानून के खिलाफ है, बल्कि यह आम लोगों और कारोबार दोनों के हित में नहीं है।
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Bike Taxi - फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
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कर्नाटक में बाइक टैक्सी एग्रीगेटर्स पर लगाए गए बैन को लेकर उबर इंडिया ने हाई कोर्ट में खुलकर विरोध दर्ज कराया है। उबर का कहना है कि सरकार का यह फैसला न सिर्फ कानून के खिलाफ है, बल्कि यह आम लोगों और कारोबार दोनों के हित में नहीं है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, उबर ने कर्नाटक हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच के सामने इस बैन के खिलाफ अपील दायर की है। 
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कानून के मुताबिक बाइक टैक्सी को मिलनी चाहिए एग्रीगेशन की छूट
उबर की तरफ से वरिष्ठ वकील श्रीनिवास राघवन ने कोर्ट में दलील दी कि मोटर व्हीकल एक्ट, 1988 के सेक्शन 93 के तहत जो नियम एग्रीगेटर लाइसेंस को रेगुलेट करते हैं, वे दो-पहिया वाहनों को बाहर नहीं करते। यानी बाइक टैक्सी का एग्रीगेशन कानून के दायरे में आता है। उनका कहना था, "अगर एक व्यक्ति खुद बाइक टैक्सी चला सकता है, तो कोई एग्रीगेटर उसे संगठित तरीके से ऑपरेट क्यों नहीं कर सकता? ये मेरा संवैधानिक हक है कि मैं कारोबार करूं। एग्रीगेशन भी तो कारोबार ही है।"
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यात्री सुविधाओं के लिए जरूरी है एग्रीगेटर सिस्टम
उबर ने जोर देकर कहा कि शहरों में जहां ट्रैफिक भारी रहता है, वहां 'लास्ट माइल कनेक्टिविटी' के लिए बाइक टैक्सी सेवाएं बेहद अहम हैं। और जब अकेले लोग अपनी बाइक से टैक्सी सेवा दे सकते हैं, तो उन्हें जोड़ने वाले प्लेटफॉर्म्स को रोकना उपभोक्ता के हित में नहीं है। उबर ने तर्क दिया, "अगर बाइक टैक्सी वैध है, तो उसे संगठित करने वाले प्लेटफॉर्म पर रोक लगाने का कोई तुक नहीं बनता।"

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उबर ने बताया सरकार का दोहरापन
उबर ने राज्य सरकार की अब बंद हो चुकी ई-बाइक नीति का हवाला देते हुए कहा कि कभी सरकार ने खुद इलेक्ट्रिक बाइक के एग्रीगेशन को मंजूरी दी थी। इसका मतलब है कि ऐसे प्लेटफॉर्म्स को अनुमति देना कानून के खिलाफ नहीं है। राघवन ने कहा, "ई-बाइक स्कीम को वापस लेना, पूरे सिस्टम को ही अवैध नहीं बना देता।"

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बैन का कोई ठोस सरकारी आदेश भी नहीं
उबर ने यह भी दावा किया कि सरकार ने बाइक टैक्सी को लेकर कोई स्पष्ट नीति बनाई ही नहीं है। वे केवल एक कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर बैन लागू कर रहे हैं, जबकि साल 2019 में सरकार ने खुद विशेषज्ञों की एक रिपोर्ट को खारिज कर दिया था, जिसमें बाइक टैक्सी को रेगुलेट करने की सिफारिश थी, न कि सीधा बैन करने की।

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कानूनी पेचीदगियों पर भी उठे सवाल
जब कोर्ट ने यह पूछा कि क्या कमर्शियल बाइक को पीले नंबर प्लेट के साथ चलाना जरूरी है, और क्या बिना परमिट वाले इलेक्ट्रिक वाहनों को भी व्यवसायिक इस्तेमाल में लाया जा सकता है। तो राघवन ने जवाब दिया कि इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर्स को ऐसे परमिट की जरूरत नहीं होती।

 
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क्या है मूल सवाल
उबर ने इस केस में एक बड़े सवाल को उठाया है। जब किसी व्यक्ति को अपने स्तर पर बाइक टैक्सी चलाने की अनुमति है, तो उसी काम को संगठित और डिजिटल तरीके से करने वाले प्लेटफॉर्म्स पर रोक कैसे लगाई जा सकती है? उबर का कहना है कि ऐसा करना नवाचार (इनोवेशन) को रोकना और शहरी परिवहन की समस्याओं का हल निकालने की कोशिशों को दबाना है।

अब इस मामले में अगली सुनवाई पर कर्नाटक सरकार अपनी दलीलें कोर्ट के सामने रखेगी। देखना दिलचस्प होगा कि अदालत किसके पक्ष में फैसला देती है - सरकार या डिजिटल प्लेटफॉर्म्स। 

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