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Toll: हाईवे टोल पर जल्द ही सैटेलाइट टेक्नोलॉजी का होगा इस्तेमाल, जानें यह कैसे करेगा काम और पूरी डिटेल्स

Mon, 10 Jun 2024 04:17 PM IST
अमर शर्मा ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

भारत एक नई उपग्रह-आधारित टोल संग्रह प्रणाली शुरू करने जा रहा है, जो वैश्विक स्तर पर पहली बार होगी। बुनियादी ढांचे को अपग्रेड करने जैसी चुनौतियों के बावजूद, यह प्रणाली भारत के परिवहन क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण प्रगति का संकेत देती है। हाईवे पर टोल कलेक्शन के लिए सैटेलाइट आधारित इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कैसे किया जाएगा, जानें इस बारे में पूरी डिटेल्स।
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Toll Plaza - फोटो : Amar Ujala/Freepik
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विस्तार
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भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) (एनएचएआई) ने नेशनल हाईवे पर यूजर्स को बिना किसी रुकावट के टोल एक्सपीरियंस देने के लिए वैश्विक स्तर पर GNSS (जीएनएसएस)-आधारित (सैटेलाइट-आधारित) इलेक्ट्रॉनिक टोल कलेक्शन सिस्टम लागू करने के लिए दुनिया भर से एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EoI) मंगाई है। एनएचएआई ने हाल ही में एक आधिकारिक बयान में इसकी जानकारी दी। यह कदम हाईवे पर स्थित टोल बूथों को खत्म करने के मकसद से उठाया गया है।
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बयान में कहा गया, "राष्ट्रीय राजमार्ग उपयोगकर्ताओं को निर्बाध और बिना किसी रुकावट के टोलिंग अनुभव प्रदान करने और टोल संचालन की दक्षता और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए, NHAI द्वारा प्रवर्तित कंपनी भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्रबंधन कंपनी लिमिटेड (IHMCL) ने अभिनव और योग्य कंपनियों से भारत में जीएनएसएस-आधारित इलेक्ट्रॉनिक टोल संग्रह प्रणाली को विकसित और लागू करने के लिए वैश्विक अभिरुचि की अभिव्यक्ति (EOI) आमंत्रित की है।"
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बयान में कहा गया है कि एडवांस्ड सैटेलाइट टेक्नोलॉजी का लाभ उठाने के लिए, EoI का उद्देश्य अनुभवी और सक्षम कंपनियों की पहचान करना है। जो मजबूत, स्केलेबल और कुशल टोल चार्जर सॉफ्टवेयर प्रदान कर सकें। जो भारत में ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GNSS) आधारित इलेक्ट्रॉनिक टोल संग्रह के कार्यान्वयन के लिए रीढ़ की हड्डी के रूप में काम करेगा।

बयान में कहा गया है कि भारत में जीएनएसएस-आधारित इलेक्ट्रॉनिक टोल संग्रह से नेशनल हाईवे पर वाहनों के सुचारू आवागमन में सुविधा होगी और हाईवे यूजर्स को कई लाभ प्रदान करने की परिकल्पना की गई है। जैसे कि बिना किसी रुकावट के निरंतर टोलिंग जिससे परेशानी मुक्त यात्रा का अनुभव होगा। और दूरी-आधारित टोलिंग जहां उपयोगकर्ता सिर्फ उसी हिस्से के लिए भुगतान करेंगे, जिस पर उन्होंने नेशनल हाईवे पर यात्रा की है।

इसके साथ ही, जीएनएसएस-आधारित इलेक्ट्रॉनिक टोल संग्रह से टोल संग्रह में भी ज्यादा दक्षता आएगी। क्योंकि इससे सिस्टम में आए किसी लीकेज को रोकने और टोल चोरी करने वालों की जांच करने में मदद मिलेगी। 

NHAI की योजना मौजूदा FASTag इकोसिस्टम के भीतर GNSS-आधारित ईटीसी प्रणाली को इंटीग्रेट करने की है। शुरुआत में, एक हाईब्रिड मॉडल का इस्तेमाल किया जाएगा। जहां RFID-आधारित ETC और GNSS-आधारित ETC दोनों एक साथ संचालित होंगे। टोल प्लाजा पर डेडिकेटेड जीएनएसएस लेन उपलब्ध होंगे। जिससे जीएनएसएस-आधारित ईटीसी से लैस वाहनों को स्वतंत्र रूप से गुजरने की अनुमति मिलेगी। जैसे-जैसे GNSS-आधारित ETC प्रणाली ज्यादा व्यापक और स्वीकृत होती जाएगी, टोल प्लाजा पर सभी लेन आखिरकार GNSS लेन में बदल जाएंगे, जिससे भारतीय राजमार्गों पर टोल संग्रह की दक्षता और सुविधा को और बढ़ावा मिलेगा।

ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GNSS) आधारित टोल संग्रह क्या है?
पारंपरिक रूप से, टोल प्लाजा पर टोल का भुगतान किया जाता था, जिसके लिए कर्मचारियों की जरूरत पड़ती है। और FASTag के साथ भी ट्रैफिक जाम लग जाते थे। जीपीएस-आधारित टोल संग्रह प्रणाली कारों में सैटेलाइट और ट्रैकिंग सिस्टम का इस्तेमाल करके तय की गई दूरी को मापने और उसके अनुसार टोल वसूलती है।

जीपीएस-आधारित टोल कलेक्शन क्या है
जीपीएस-आधारित टोल कलेक्शन सिस्टम कारों में सैटेलाइट और ट्रैकिंग सिस्टम का इस्तेमाल करके तय की गई दूरी को मापने के लिए करती है। और तय की गई दूरी के आधार पर टोल वसूलती है। इससे टोल प्लाजा की जरूरत खत्म हो जाती है और यात्रियों का समय बचता है।

यह FASTag से किस तरह अलग होगा?
FASTag के उलट, सैटेलाइट-आधारित जीपीएस टोल संग्रह प्रणाली, ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GNSS) पर काम करती है, जो सटीक स्थान ट्रैकिंग क्षमता प्रदान करती है। यह प्रणाली दूरी के आधार पर सटीक टोल गणना के लिए ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS) और भारत के GPS एडेड जियो ऑगमेंटेड नेविगेशन (GAGAN) जैसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करती है।

ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम कैसे काम करता है?
ऑन-बोर्ड यूनिट (OBU) या ट्रैकिंग डिवाइस वाले वाहनों से हाईवे पर तय की गई दूरी के आधार पर शुल्क लिया जाएगा। डिजिटल इमेज प्रोसेसिंग नेशनल हाईवे के साथ निर्देशांक रिकॉर्ड करता है। जिससे सॉफ्टवेयर को टोल दरों का निर्धारण करने की अनुमति मिलती है। सीसीटीवी कैमरों वाले गैंट्री सुचारू संचालन सुनिश्चित करते हुए अनुपालन की निगरानी करते हैं।

ऑन-बोर्ड यूनिट (OBU)
कारें टोल संग्रह के लिए ट्रैकिंग डिवाइस के रूप में काम करने वाले OBU से लैस होंगी।

ट्रैकिंग सिस्टम
OBU हाईवेऔर टोल सड़कों पर कार के निर्देशांक को ट्रैक करेगा, जिसे दूरी की गणना के लिए उपग्रहों के साथ साझा किया जाएगा।

जीपीएस और जीएनएसएस
सिस्टम दूरी की गणना में सटीकता के लिए जीपीएस और जीएनएसएस का इस्तेमाल करता है।

कैमरे
हाईवे पर लगे कैमरे कार के निर्देशांक की तुलना ली गई तस्वीरों के साथ करके उचित दूरी माप सुनिश्चित करते हैं। 

कार्यान्वयन
शुरुआत में, इस सिस्टम को प्रमुख हाईवे और एक्सप्रेसवे पर लागू किया जाएगा।

OBU की उपलब्धता
OBU सरकारी वेबसाइटों के जरिए FASTag की तरह उपलब्ध होंगे।

इंस्टॉलेशन
OBU को फिलहाल बाहरी रूप से लगाने की जरूरत होगी। लेकिन भविष्य में कार निर्माता पहले से ही इन उपकरणों के साथ कारें बेचना शुरू कर सकते हैं।

भुगतान प्रक्रिया
एक बार लग जाने के बाद, तय की गई दूरी के आधार पर लिंक किए गए बैंक खाते से ऑटोमैटिक रूप से टोल राशि काट ली जाएगी।

भुगतान प्रक्रिया और पायलट कार्यान्वयन
OBU से जुड़े डिजिटल वॉलेट से भुगतान काट लिया जाता है, जिससे टोल भुगतान सुव्यवस्थित हो जाता है। राष्ट्रीय राजमार्गों के चुनिंदा खंड पर पायलट परियोजनाएं इस GNSS-आधारित इलेक्ट्रॉनिक टोल संग्रह (ETC) प्रणाली की प्रभावशीलता की टेस्टिंग करती हैं। जिसे शुरूआत में FASTag के साथ लागू किया जाएगा।

टोल राजस्व पर प्रभाव
इस समय, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) लगभग 40,000 करोड़ रुपये टोल राजस्व के रूप में एकत्र करता है। यह आंकड़ा अगले 2-3 वर्षों में भारत के इस एडवांस्ड टोल संग्रह प्रणाली में परिवर्तन के साथ 1.40 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ने का अनुमान है।

क्या यह भारत में चल पाएगा?
सड़क नेटवर्क के विशाल साइज और वाहनों की विविध रेंज के कारण भारत में GPS-आधारित टोल संग्रह प्रणाली को लागू करने में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि भारत ने लागत बचत के लिए डिजिटल लेनदेन और नई तकनीकों को अपनाने में दक्षता दिखाई है। इस सिस्टम को अपनाने के लिए बुनियादी ढांचे में महत्वपूर्ण बदलावों की जरूरत होगी। फास्टैग पर केंद्रित मौजूदा बुनियादी ढांचे को बदलने की आवश्यकता होगी। जो ग्राहकों के लिए टोल कीमतों में इजाफा कर सकता है। इन चुनौतियों के बावजूद, यह सिस्टम भारत में टोल संग्रह प्रक्रियाओं को सुव्यस्थित करने के लिए एक दूरदर्शी दृष्टिकोण पेश करता है।
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सैटेलाइट आधारित टोल कलेक्शन सिस्टम भारत के परिवहन ढांचे के आधुनिकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। कार्यकुशलता बढ़ाने और यात्रा के समय को कम करने की अपनी क्षमता के साथ, यह सिस्टम भारतीय राजमार्गों पर यात्रियों के अनुभव को बदलने का वादा करती है।
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