इनमें सरकारी और निजी वाहनों की हिस्सेदारी क्या है?
स्क्रैप किए गए कुल वाहनों में से लगभग 1.65 लाख वाहन सरकारी विभागों के थे, जबकि करीब 2.39 लाख वाहन निजी स्वामित्व वाले थे। इससे यह साफ होता है कि नीति का असर सिर्फ सरकारी बेड़े तक सीमित नहीं है। बल्कि आम वाहन मालिक भी इस प्रक्रिया का हिस्सा बन रहे हैं।
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Tata Motors vehicle scrapping facility
- फोटो : Tata Motors
निजी निवेश और संसाधन पुनर्प्राप्ति में क्या प्रगति हुई है?
गडकरी के अनुसार, इस नीति के चलते अब तक करीब 27 अरब रुपये का निजी निवेश आकर्षित हुआ है। भारत हर साल लगभग 60 लाख टन स्क्रैप सामग्री आयात करता है। जिसमें से अब तक 3.76 लाख टन स्क्रैप स्टील की रिकवरी की जा चुकी है। यह करीब 6 प्रतिशत की रिकवरी दर को दर्शाता है।
स्क्रैपिंग प्रक्रिया के जरिए स्टील, लेड, एल्युमिनियम, प्लेटिनम और पैलेडियम जैसे महत्वपूर्ण धातुएं फिर से हासिल हो हो रही हैं, जो आमतौर पर आयात पर निर्भर रहती हैं। इससे देश की आयात निर्भरता घटाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
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इस नीति से अर्थव्यवस्था और पर्यावरण को क्या लाभ हो रहा है?
मंत्री ने कहा कि वाहन स्क्रैपिंग नीति से लगभग 40,000 करोड़ रुपये का जीएसटी राजस्व पैदा होने की संभावना है। इसके साथ ही पूरी वैल्यू चेन में करीब 70 लाख नए रोजगार सृजित होने का अनुमान है।
उन्होंने यह भी बताया कि कच्चे माल के फिर से इस्तेमाल करने की दर अब 33 प्रतिशत तक पहुंच गई है। जिससे कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में 6,353 किलो टन की कमी आई है। यह प्रभाव पर्यावरण के लिहाज से लगभग 26 करोड़ पेड़ लगाने के बराबर बताया गया है।
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सरकार इस पहल को कैसे देख रही है?
गडकरी ने इस नीति को 'वेस्ट टू वेल्थ' पहल करार देते हुए कहा कि एंड-ऑफ-लाइफ वाहनों की स्क्रैपिंग से बेकार संसाधनों को दोबारा उपयोग में लाया जा रहा है। इससे न केवल पर्यावरण संरक्षण को मजबूती मिलती है, बल्कि भारत की सर्कुलर इकोनॉमी भी और मजबूत होती है।
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