इंडस्ट्री संगठन इस सुस्ती को कैसे देख रहा है?
ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ACMA) के अध्यक्ष विक्रमपति सिंघानिया ने इस सुस्ती को एक अस्थायी स्थिति बताया है। समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में उन्होंने कहा कि सेक्टर के बुनियाद अब भी मजबूत हैं और मौजूदा चुनौतियां लंबे समय तक असर डालने वाली नहीं हैं।
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क्या ट्रेड एग्रीमेंट्स एक्सपोर्ट के लिए सहारा बन सकते हैं?
वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता के बीच उद्योग को उम्मीद है कि भारत के चल रहे ट्रेड समझौते स्थिति को संतुलित कर सकते हैं।
- भारत की यूरोपीय संघ, यूनाइटेड किंगडम और न्यूजीलैंड के साथ
- द्विपक्षीय और फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) (एफटीए) पर बातचीत जारी है
- इससे एक्सपोर्ट के लिए नए बाजार खुल सकते हैं
- अमेरिका में अस्थायी सुस्ती आने पर भी अन्य बाजार नुकसान की भरपाई कर सकते हैं
सिंघानिया के मुताबिक, अलग-अलग बाजारों में मौजूदगी बढ़ने से एक्सपोर्ट को झटका कम लगेगा।
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GST कटौती से घरेलू मांग को कैसे बल मिला है?
घरेलू बाजार में ऑटो कंपोनेंट सेक्टर को जीएसटी दरों के सरलीकरण से समर्थन मिला है।
- पहले ऑटो कंपोनेंट्स पर 28 प्रतिशत और 18 प्रतिशत की दोहरी जीएसटी संरचना थी
- अब इसे एक समान 18 प्रतिशत स्लैब में लाया गया है
इस बदलाव से सप्लाई चेन में भ्रम कम हुआ है और ऑपरेशंस आसान हुए हैं। सिंघानिया के अनुसार, जीएसटी घटने से वाहन कंपनियों की मांग बढ़ी और उसी के साथ ऑटो कंपोनेंट सप्लाई चेन में भी रफ्तार आई।
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अंतरराष्ट्रीय टैरिफ को लेकर सरकार की भूमिका क्या है?
- सिंघानिया ने माना कि अंतरराष्ट्रीय टैरिफ अल्पकालिक रूप से कुछ रुकावटें पैदा कर सकते हैं।
- हालांकि सरकार लगातार वैश्विक साझेदारों के साथ संवाद में है।
- मकसद भारतीय ऑटो कंपोनेंट सप्लाई चेन के हितों की रक्षा करना है।
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वित्त वर्ष की पहली छमाही में प्रदर्शन कैसा रहा?
पहली छमाही (H1) के आंकड़े सेक्टर के लिए सकारात्मक रहे हैं।
- कुल इंडस्ट्री ग्रोथ: 6.8%
- ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (OEMs) को सप्लाई: 7% से अधिक की बढ़त
- घरेलू आफ्टरमार्केट: पिछले साल की तुलना में करीब 9% की मजबूत रिकवरी
सिंघानिया के अनुसार, पहली छमाही में सेक्टर कुल मिलाकर स्थिर और मजबूत बना रहा।
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एक्सपोर्ट मोर्चे पर तस्वीर कैसी है?
निर्यात के लिहाज से भी स्थिति संतुलित बताई जा रही है।
- अमेरिका को निर्यात भारत के लिए काफी हद तक स्थिर रहा
- कुछ अन्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों में वृद्धि दर्ज की गई
सिंघानिया ने बताया कि ऑटो कंपनियों के लिए सप्लायर बदलना आसान नहीं होता, क्योंकि
- क्वालिफिकेशन
- क्वालिटी अप्रूवल
जैसी प्रक्रियाएं समय लेती हैं, जिससे भारतीय सप्लायर्स को स्थिरता मिलती है।
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आगे का आउटलुक क्या संकेत देता है?
हालांकि साल की दूसरी छमाही में चुनौतियां बढ़ सकती हैं, लेकिन
- मजबूत घरेलू मांग
- जीएसटी सरलीकरण
- और संभावित ट्रेड एग्रीमेंट्स
ऑटो कंपोनेंट इंडस्ट्री के लिए सहारा बने रह सकते हैं।
कुल मिलाकर, सेक्टर निकट भविष्य में कुछ दबावों के बावजूद संरचनात्मक रूप से मजबूत स्थिति में बना हुआ दिख रहा है।
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