मानवीय दखल कम करने पर सरकार का फोकस
हालांकि अभी अंतिम योजना को मंजूरी नहीं मिली है। लेकिन सरकार मौजूदा व्यवस्था से हटकर ऐसे विकल्प तलाश रही है, जिनमें मानवीय हस्तक्षेप न्यूनतम हो।
एक अधिकारी के मुताबिक, लक्ष्य यह है कि रोबोटिक्स और सेंसर आधारित तकनीक के जरिए रियल-टाइम में वाहनों के उत्सर्जन की जांच की जा सके। साथ ही नए पीयूसी केंद्रों के लिए जगह, एंट्री-एग्जिट व्यवस्था और बुनियादी ढांचे की भी समीक्षा की जा रही है, ताकि प्रक्रिया पारदर्शी और प्रभावी बन सके।
निजी वाहनों तक बढ़ेगा ऑटोमेटेड टेस्टिंग सिस्टम
एक अन्य अधिकारी ने बताया कि फिलहाल ऑटोमेटेड उत्सर्जन जांच प्रणाली वाणिज्यिक वाहनों के लिए मौजूद है। सरकार की दीर्घकालिक योजना है कि इसी तरह की तकनीक को निजी यानी नॉन-कमर्शियल वाहनों तक भी विस्तार दिया जाए। रिमोट सेंसिंग और रोबोटिक्स के इस्तेमाल से फर्जीवाड़े की गुंजाइश कम होगी।
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ऑडिट रिपोर्ट में सामने आईं चौंकाने वाली गड़बड़ियां
सीएजी रिपोर्ट के अनुसार, 2015 से 2020 के बीच जांचे गए 22.1 लाख डीजल वाहनों में से करीब 24 प्रतिशत के उत्सर्जन आंकड़े दर्ज ही नहीं किए गए थे। 4,000 से अधिक मामलों में तय सीमा से ज्यादा प्रदूषण करने वाले वाहनों को भी 'पास' घोषित कर दिया गया।
रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि लगभग 7,700 मामलों में एक ही केंद्र पर एक साथ कई वाहनों की जांच दिखाई गई, जिससे फर्जी सर्टिफिकेशन की आशंका बढ़ी। इसके अलावा 76,865 मामलों में एक मिनट से भी कम समय में पीयूसी सर्टिफिकेट जारी कर दिए गए, जो व्यावहारिक रूप से असंभव है।
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आधुनिक तकनीक अपनाने में देरी पर सवाल
सीएजी ने यह भी बताया कि रिमोट सेंसिंग जैसी आधुनिक तकनीकों को अपनाया नहीं गया, जबकि इस पर 2009 से विचार चल रहा था। और सुप्रीम कोर्ट भी इसे बार-बार लागू करने पर जोर दे चुका है।
क्यों है यह जरूरी
पीयूसी 2.0 के जरिए दिल्ली सरकार का लक्ष्य प्रदूषण जांच व्यवस्था को पारदर्शी, भरोसेमंद और तकनीक आधारित बनाना है। अगर यह मॉडल लागू होता है, तो न सिर्फ फर्जीवाड़े पर लगाम लगेगी, बल्कि राजधानी में वाहनों से होने वाले प्रदूषण की सटीक निगरानी भी संभव हो सकेगी।