CAFE नॉर्म्स पर विवाद क्या है
CAFE यानी कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल इकॉनोमी, नॉर्म्स दुनिया भर में वाहनों के कार्बन उत्सर्जन घटाने के लिए लागू किए जाते हैं। ये नॉर्म्स किसी कंपनी के पूरे वाहन पोर्टफोलियो की औसत फ्यूल-एफिशियंसी तय करते हैं। लेकिन ट्रक निर्माता कंपनियों का कहना है कि भारत में प्रस्तावित नियम फिक्स्ड-स्पीड लैब टेस्टिंग पर आधारित हैं। जो असली सड़कों पर चलने वाले भारी ट्रकों के व्यवहार और फ्यूल खपत को बिल्कुल भी सही तरीके से नहीं दिखाते।
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CV कंपनियां नया तरीका क्यों चाहती हैं
वाणिज्यिक वाहन उद्योग चाहता है कि सरकार पुराने टेस्टिंग सिस्टम की जगह भारत वेक्टर टूल (Bharat Vector Tool) (व्हीकल एनर्जी कंजम्पशन टूल) को अपनाए। यह सिस्टम वास्तविक ड्राइविंग कंडीशंस को मॉडल करता है, जैसे-
- बदलते रास्ते और चढ़ाई
- अलग-अलग लोड
- ट्रैफिक, ब्रेकिंग, रुकावटें
- शहर और हाईवे की मिश्रित ड्राइविंग
इन सभी कारकों से ट्रकों की फ्यूल खपत और उत्सर्जन काफी बदलते हैं। इसलिए उद्योग का मानना है कि वास्तविक दुनिया जैसे टेस्ट ही फ्यूल-एफिशियंसी को सही तरीके से दर्शा सकते हैं।
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लाइट कमर्शियल व्हीकल्स को अलग छूट क्यों चाहिए
वाणिज्यिक वाहन उद्योग ने सरकार से N1 कैटेगरी और LCV (लाइट कमर्शियल व्हीकल्स) को CAFE नॉर्म्स से अलग छूट देने की मांग भी की है। कंपनियों का तर्क है-
- ये वाहन भारत के ट्रांसपोर्ट ईकोसिस्टम का सिर्फ 2 प्रतिशत ईंधन इस्तेमाल करते हैं।
- इनका CO₂ उत्सर्जन पूरे सेक्टर का 1 प्रतिशत से भी कम है।
ऐसे में भारी नियम लागू करने का पर्यावरण पर असर बहुत कम होगा। लेकिन उद्योग के लिए अनुपालन की लागत बढ़ जाएगी।
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क्या है आगे की राह
सरकार अगले चरण के CAFE नॉर्म्स को अंतिम रूप देने पर काम कर रही है। उद्योग का कहना है कि-
- भारी ट्रकों और हल्के वाहनों के लिए नियम अलग होने चाहिए।
- दक्षता का मापदंड वास्तविक सड़क स्थितियों पर आधारित होना चाहिए, न कि केवल लैब टेस्ट पर।
इन बदलावों से तय होगा कि भारत कैसे कम उत्सर्जन की दिशा में आगे बढ़ेगा, जबकि देश की माल ढुलाई और लॉजिस्टिक्स प्रणाली भी बिना बाधा के चलती रहे।
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