Vehicle Emissions Air Pollution: एक नए अध्ययन में पाया गया है कि वास्तविक ड्राइविंग परिस्थितियों में वाहनों का एक बड़ा प्रतिशत वाहन प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (पॉल्यूशन अंडर कंट्रोल सर्टिफिकेट) (PUCC) (पीयूसीसी) सीमा से अधिक उत्सर्जन प्रदर्शित करता है। अध्ययन ने PUCC निरीक्षण प्रक्रिया के पूरक के लिए नजदीकी भविष्य में रिमोट सेंसिंग का इस्तेमाल करने का आह्वान किया है।
इंटरनेशनल काउंसिल ऑन क्लीन ट्रांस्पोर्टेशन (अंतर्राष्ट्रीय स्वच्छ परिवहन परिषद) (ICCT) द्वारा दिल्ली और गुरुग्राम प्राधिकरणों के सहयोग से किए गए अध्ययन में कहा गया है कि प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र (PUCC) टेस्ट रियल-वर्ल्ड ड्राइविंग उत्सर्जन को प्रतिबिंबित नहीं करती है।
अध्ययन में कहा गया है कि पीयूसीसी प्रक्रिया की सीमाओं के कारण, व्यापक परिस्थितियों में रिमोट सेंसिंग द्वारा पहचाने गए उच्च-उत्सर्जक की री-टेस्टिंग (पुन: परीक्षण) करने के लिए बुनियादी ढांचा लंबे समय में स्थापित किया जा सकता है।
यह भी पाया गया कि कंप्रेस्ड नेचुरल गैस (सीएनजी) वाहनों में भी उच्च उत्सर्जन होते हैं। विशेष रूप से नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx), जिसका मतलब है कि उन्हें दिल्ली और गुरुग्राम जैसे क्षेत्रों में जो खराब वायु गुणवत्ता से पीड़ित हैं, उन्हें प्रैक्टिकल ऑप्शन (व्यवहार्य विकल्प) या शून्य-उत्सर्जन वाहनों के लिए संक्रमणकालीन कदम के रूप में बढ़ावा देना सही नजरिया नहीं हो सकता है।
अध्ययन में पाया गया कि सीएनजी वाहनों में कुछ मामलों में, प्रयोगशाला-अनुमोदित सीमाओं की तुलना में 14 गुना ज्यादा रियल-वर्ल्ड उत्सर्जन था।
ICCT ने दिसंबर 2022 और अप्रैल 2023 के बीच दिल्ली और गुरुग्राम के आसपास 20 स्थानों पर रिमोट-सेंसिंग तकनीक का इस्तेमाल करके अध्ययन किया। कुल 1,11,712 (1.11 लाख) टेलपाइप उत्सर्जन माप किए गए थे। और अध्ययन किए गए वाहनों में दो और तीन-पहिया वाहन, निजी कार, टैक्सी, हल्के माल वाहन और बसे शामिल थीं।
अध्ययन के दौरान शामिल किए गए लगभग 45 प्रतिशत वाहन पेट्रोल, 32 प्रतिशत सीएनजी और 23 प्रतिशत डीजल थे।
अध्ययन के अनुसार, लेटेस्ट उत्सर्जन मानक - भारत स्टेज (बीएस) -VI के लिए उत्पादित वाहनों ने सभी प्रदूषक और वाहन प्रकारों में टेलपाइप उत्सर्जन में उल्लेखनीय सुधार दिखाया।
बीएस-VI निजी कारों से रियल-वर्ल्ड NOx उत्सर्जन में BS-IV की तुलना में 81 प्रतिशत और बसों में लगभग 95 प्रतिशत की कमी आई है। इसने बताया कि कई रियल-वर्ल्ड के उत्सर्जन निर्धारित सीमा से ज्यादा बने रहे, खासकर NOx के लिए।
अध्ययन में कहा गया है कि ज्यादा इस्तेमाल होने वाले वाणिज्यिक वाहनों से निकलने वाला उत्सर्जन निजी वाहनों की तुलना में काफी ज्यादा है।
अध्ययन में डेटा से पता चला है कि बीएस-VI टैक्सियों और हल्के माल वाहन बेड़े ने अपने निजी वाहन में इस्तेमाल होने वाले समकक्षों की तुलना में क्रमशः 2.4 और पांच गुना ज्यादा NOx उत्सर्जन का उत्सर्जन किया।
इसी तरह, सीएनजी वाहन बेड़े ने भी उच्च NOx उत्सर्जन दिखाया। जो इस धारणा को चुनौती देता है कि सीएनजी एक "स्वच्छ" वैकल्पिक ईंधन था। आंकड़ों का हवाला देते हुए, अध्ययन में कहा गया है कि द्वितीय श्रेणी के हल्के माल वाहन अपने NOx प्रयोगशाला सीमा से 14.2 गुना और टैक्सी चार गुना तक उत्सर्जन कर रहे थे।
निष्कर्षों के महत्व को समझाते हुए आईसीसीटी इंडिया के प्रबंध निदेशक अमित भट्ट ने कहा कि यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि वायु की गुणवत्ता पर प्रभाव प्रयोगशाला से निकलने वाले उत्सर्जन से नहीं, बल्कि वाहनों को चलाने के दौरान उनसे निकलने वाले प्रदूषकों से पड़ता है।
उन्होंने कहा, "इसलिए, समय आ गया है कि हम अपने उत्सर्जन परीक्षण व्यवस्था को फिर से परिभाषित करें। और शून्य-उत्सर्जन वाहनों को अपनाने के लिए आक्रामक तरीके से आगे बढ़ें।"
अध्ययन में कहा गया है कि सीएनजी वाहनों को शून्य-उत्सर्जन वाहनों के लिए एक व्यवहार्य विकल्प या संक्रमणकालीन कदम के रूप में मानना, विशेष रूप से दिल्ली और गुरुग्राम जैसे खराब वायु गुणवत्ता वाले क्षेत्रों में, सही दृष्टिकोण नहीं हो सकता है।
अध्ययन के हिस्से के रूप में, सड़क के दो छोर पर रिमोट सेंसिंग डिवाइस लगाए गए थे। जब कोई वाहन गुजरता था, तो स्पेक्ट्रोमीटर उसके टेलपाइप उत्सर्जन को कैप्चर करता था। एक कैमरे ने नंबर प्लेट को कैप्चर किया ताकि यह पता लगाया जा सके कि वाहन दिल्ली में पंजीकृत है या नहीं, अगर यह वाणिज्यिक वाहन है, तो इसका निर्माण और लाइफ कितनी है।