भारत सरकार ने वर्ष 2000 में स्टैंडर्ड यूरोपीय मानदंडों को भारतीय अनुरूप में अपनाते हुए बीएस यानी 'भारत स्टेज' की शुरुआत की। यह गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण के उत्सर्जन का मानक है। इसे पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड वाहनों के लिए तय करता है।
बीएस-3 और बीएस-4 से होने वाले नुकसान
बीएस-3 वाहनों से निकलने वाला धुआं हमारी सेहत के लिए काफी घातक है, जबकि बीएस-4 भी कुछ कम नहीं है। इनसे निकलने वाला धुआं कई बीमारियों को जन्म देता है, जैसे आंखो में जलन, नाक में जलन, सिरदर्द, फेफड़ो की बीमारी, और उल्टी आना।
पर्यावरण को फायदा
नए मानक से हवा में प्रदूषण की मात्रा में कमी आएगी। हवा में जहरीले तत्व कम होने से सांस लेने में परेशानी नहीं होगी। नाइट्रोजन ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाईऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर के मामले में बीएस-6 ग्रेड का डीजल काफी अच्छा होगा। बीएस-4 और बीएस-3 फ्यूल में सल्फर की मात्रा 50 पीपीएम होती है। यह बीएस-6 स्टैंडर्ड आने के बाद घटकर 10 पीपीएम रह जाएगा। यानी की अभी के स्तर से 80 फीसदी कम।
बीएस-5 लागू नहीं
बीएस-5 और बीएस-6 ईंधन में जहरीले सल्फर की मात्रा बराबर होती है। जहां बीएस-4 ईंधन में 50 पीपीएम (पार्ट्स पर मिलियन) सल्फर होता है, वहीं बीएस-5 और बीएस-6 दोनों तरह के ईंधनों में सल्फर की मात्रा 10 पीपीएम ही होती है। इसलिए सरकार ने बीएस-4 के बाद सीधे बीएस-6 लाने का फैसला किया।
जब भी बीएस (भारत स्टेज) को अपग्रेड किया जाता है, तो वाहनों से धुएं के रूप में होने वाले प्रदूषण पर काफी हद तक रोक लगाई जाती है। इस समय भारत में प्रदूषण काफी ज्यादा रहता है जबकि देश की राजधानी दिल्ली की हवा सबसे खतरनाक है, ऐसे में बीएस-6 को अपनाना बड़ी जरुरत बन गया है।
ईंधन और भी महंगा होगा
सरकारी तेल कंपनियां बीएस-6 ईंधन सप्लाई के लिए रिफाइनरियों में 28,000 करोड़ रुपए लगाएंगी। एक अप्रैल, 2020 से सभी कंपनियों को दिल्ली, एनसीआर और करीबी जिलों में बीएस-6 ग्रेड की ईंधन बिक्री शुरू करनी होगी। इससे पेट्रोल के दाम करीब 24 पैसे और डीजल के दाम 66 पैसे प्रति लीटर तक बढ़ जाएंगे।
पुराने वाहनों को लेकर मतभेद
बीएस-4 के पुराने वाहन चलते रहेंगे या नहीं, स्थिति साफ नहीं है, लेकिन अगर 2020 से बीएस-6 इंजन वाले वाहनों का उत्पादन जरूरी हो जाएगा तो इसे लेकर भी पॉलिसी बनानी होगी। इसमें सबसे जरूरी होगी पुराने वाहनों के लिए स्क्रैप पॉलिसी। अगर पुराने वाहन मालिक ये चाहें कि नए ईंधन की मदद से वे प्रदूषण कम करने में मदद करें तो ऐसा नहीं होगा।
बीएस-4 पेट्रोल इंजन में बीएस-6 पेट्रोल के इस्तेमाल से कोई फर्क नहीं पड़ेगा, हालांकि डीजल पर असर पड़ेगा। फिलहाल बिक रहे डीजल में सल्फर की मात्रा 50 पीपीएम और बीएस-6 डीजल में इसकी मात्रा महज 10 पीपीएम रह जाएगी। विशेषज्ञों का कहना है कि बीएस-6 फ्यूल के साथ बीएस-6 इंजन ज्यादा बेहतर परिणाम देगा।
ये आम धारणा है कि पेट्रोल की तुलना में डीजल वाहन ज्यादा प्रदूषण देते हैं। ऐसे में अगर बीएस-6 लागू होगा तो पेट्रोल और डीजल कारों के बीच ज्यादा अंतर नहीं रह जाएगा। हालांकि इससे डीजल वाहनों से 68 फीसदी और पेट्रोल कारों से 25 फीसदी तक नाइट्रोजन ऑक्साइड का उत्सर्जन कम हो जाएगा। बीस-4 की तुलना में बीस-6 काफी बेहतर होगा और प्रदूषण को रोकने में काफी हद तक मदद मिलेगी।
सीएसई के अनुसार बीएस-6 ईंधन से सल्फर की मात्रा बीएस-4 से पांच गुना तक कम होगी। यह काफी स्वच्छ ईंधन है। इसके इस्तेमाल से सड़कों पर चल रही पुरानी गाड़ियों से भी फैल रहा प्रदूषण कम हो जाएगा। बीएस-6 वाहनों में एडवांस इमीशन कंट्रोल सिस्टम फिट होगा। इसका पूरी तरह लाभ तभी मिलेगा, जब वाहनों में भी पूरी तरह बीएस-6 तकनीकी आएगी।
महंगाई के साथ माइलेज भी
बीएस-6 वाहन में नया इंजन और इलेक्ट्रिकल वायरिंग बदलने से वाहनों की कीमत में 15 फीसदी का इजाफा हो सकता है। बीएस-6 से वाहनों की इंजन की क्षमता बढ़ेगी। जिसका नतीजा ये होगा कि कारें 4.1 लीटर में 100 किलोमीटर से अधिक माइलेज देंगी। वाहन निर्माता कंपनियां माइलेज में फर्जीवाड़ा नहीं कर पाएंगी।