आंकड़ों के अनुसार सितंबर और नवंबर 2019 तक आठ लाख (प्रदूषण नियंत्रण सर्टिफिकेट) पीयूसी का वितरण दिल्ली के 943 केंद्र पर किया गया है। साथ ही, किसी में भी नाइट्रोजन ऑक्साइड और पीएम 2.5 उत्सर्जन की जानकारी नहीं दी गई है।
जानकारों के अनुसार, यूरोप, अमेरिका के अलावा भी ऐसे कई देश हैं जहां प्रदूषण जांच केंद्र पर नाइट्रोजन ऑक्साइड, पीएम 2.5, कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन जैसे प्रदूषण के कारकों की जांच की जाती है। वहीं, भारत में कम ही जगह है, जहां इनके जांच के लिए मशीनें उपलब्ध हैं।
बता दें कि दिल्ली में मात्र दो पीयूसी केंद्र हैं, जहां पर कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोकार्बन के उत्सर्जन की जांच संभव है। वहां भी केवल पेट्रोल से चलने वाली गाड़ियों की ही जांच हो पाती है।
PUC का फुल फॉर्म है पॉल्यूशन अंडर कंट्रोल। इसकी जांच को कहते हैं पीयूसी टेस्ट। इस जांच के बाद ही किसी गाड़ी को पीयूसी सर्टिफिकेट दिया जाता है। यह सर्टिफिकेट एक निश्चित समय के लिए मान्य होता है। BS4 गाड़ियों के लिए यह समय सीमा एक साल की होती है। जबकि अन्य गाड़ियों के लिए एक बार किया गया प्रदूषण जांच और पीयूसी सर्टिफिकेट तीन महीने तक ही मान्य होता है।
अगर आपकी गाड़ी के पीयूसी सर्टिफिकेट की समय सीमा खत्म हो चुकी है, तो पकड़े जाने पर आपको इसके लिए 10 हजार रुपये का जुर्माना भरना पड़ सकता है। नया कानून लागू होने से पहले जुर्माने की राशि पहली बार की गलती के लिए एक हजार और इसके बाद के लिए दो हजार रुपये थी।
वाहनों के प्रदूषण की जांच करवाकर नया सर्टिफिकेट प्राप्त करने के लिए आपको सिर्फ 60 से 100 रुपये तक ही देने होंगे। भारत में गाड़ियों के प्रदूषण की जांच की प्रक्रिया सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैनुफैक्चरर्स (सियाम) की तरफ से विकसित की गई है।
प्रदूषण की जांच के लिए एक गैस एनालाइजर को एक ऐसे कंप्यूटर से जोड़ा जाता है, जिसमें कैमरा और प्रिंटर भी जुड़ा हो। यह गैस एनालाइजर गाड़ी से निकलने वाले प्रदूषण के आंकड़ों की जांच करता है और इसे कंप्यूटर को भेजता है। जबकि कैमरा गाड़ी के लाइसेंस प्लेट की फोटो लेता है। अगर गाड़ी से निश्चित दायरे के अंदर प्रदूषण निकल रहा हो, तो पीयूसी सर्टिफिकेट जारी कर दिया जाता है।