दिल्ली-एनसीआर में 1 अप्रैल 2030 के बाद केवल इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की बिक्री अनिवार्य करने के वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) के प्रस्ताव का घरेलू ऑटोमोबाइल उद्योग ने कड़ा विरोध किया है। उद्योग संगठनों का कहना है कि इतने बड़े नीति बदलाव से पहले एक ठोस और ताजा वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है। ताकि यह स्पष्ट हो सके कि वाहनों का प्रदूषण में वास्तविक योगदान कितना है।
बैठक में उद्योग प्रतिनिधियों की आपत्ति क्या रही?
बैठक में शामिल कई सूत्रों के अनुसार, CAQM (सीएक्यूएम) की विशेषज्ञ समिति के अध्यक्ष और आईआईटी मद्रास के प्रोफेसर अशोक झुनझुनवाला ने यह रुख अपनाया कि प्रस्ताव पर आगे बढ़ने के लिए किसी वैज्ञानिक अध्ययन की जरूरत नहीं है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, एक वरिष्ठ ऑटो उद्योग अधिकारी ने बताया कि बैठक में मौजूद उद्योग नेताओं और तकनीकी विशेषज्ञों को अपनी बात रखने का पूरा मौका नहीं दिया गया। उनके मुताबिक, वाहनों के प्रदूषण में योगदान का वैज्ञानिक आकलन कराने की सर्वसम्मत मांग को नजरअंदाज कर दिया गया।
पुराने आंकड़ों और मौजूदा हकीकत में अंतर क्यों बताया जा रहा है?
उद्योग प्रतिनिधियों ने तर्क दिया कि 2018 में द एनर्जी एंड रिसोर्स इंस्टीट्यूट (TERI) और ऑटोमोटिव रिसर्च एससोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI) द्वारा किए गए अध्ययन में सामने आया था कि परिवहन से जुड़े कुल प्रदूषण में कारों की हिस्सेदारी मात्र 3.4 प्रतिशत थी।
इसके बाद ऑटो उद्योग में बड़े तकनीकी बदलाव हुए हैं, जिनमें बीए-6 उत्सर्जन मानक, CAFE-2 नियमों का लागू होना और एथनॉल मिश्रण जैसे कदम शामिल हैं। उद्योग का कहना है कि आने वाले CAFE-3, बीएस-7 और अन्य नियमों के मद्देनजर एक नया वैज्ञानिक अध्ययन और भी जरूरी हो जाता है।
Car Pollution
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क्या ईवी-केंद्रित नीति वैकल्पिक तकनीकों को नजरअंदाज कर रही है?
कुछ वाहन निर्माताओं ने यह भी चिंता जताई कि केवल ईवी पर केंद्रित दृष्टिकोण हाइब्रिड और फ्लेक्स-फ्यूल जैसी वैकल्पिक तकनीकों को दरकिनार करता है। जबकि मौजूदा नीतियां मल्टी-टेक्नोलॉजी अप्रोच को बढ़ावा देती हैं।
बैठक में मारुति सुज़ुकी, ह्यूंदै, महिंद्रा एंड महिंद्रा, टाटा, टोयोटा, होंडा और किआ जैसी प्रमुख कंपनियों के प्रतिनिधि मौजूद थे। इसके अलावा भारी उद्योग मंत्रालय, सड़क परिवहन मंत्रालय, नीति आयोग, ICAT, ARAI, TERI, AIIMS और IIT से जुड़े अधिकारी भी शामिल हुए।
क्या यह बैठक वास्तव में स्टेकहोल्डर्स की थी?
बैठक में शामिल एक तकनीकी विशेषज्ञ ने भी वैज्ञानिक अध्ययन की मांग का समर्थन किया। उनका कहना था कि यह बैठक एकतरफा रही और इसे स्टेकहोल्डर्स की चर्चा की बजाय एक व्याख्यान जैसा महसूस हुआ। जहां सवाल पूछने या अलग राय रखने का मौका नहीं मिला।
सूत्रों के अनुसार, समिति अध्यक्ष ने वाहन निर्माताओं से कम कीमत वाली कारें लाने और मौजूदा ईवी मॉडलों की गुणवत्ता सुधारने की बात भी कही।
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चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर क्या चिंताएं हैं?
उद्योग प्रतिनिधियों ने बड़े पैमाने पर ईवी अपनाने में चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी को एक बड़ी बाधा बताया। इस पर समिति की ओर से "राइट टू चार्ज" जैसे ढांचे को लागू करने की बात कही गई। लेकिन यह आकलन करने पर सहमति नहीं बनी कि अगर सभी नई गाड़ियां इलेक्ट्रिक हों तो कितने चार्जिंग स्टेशन चाहिए होंगे।
CAQM का आगे का रोडमैप क्या है?
सीएक्यूएम की योजना के अनुसार, एनसीआर क्षेत्र में 1 अप्रैल 2027 से सभी नई टैक्सियों को इलेक्ट्रिक होना होगा। इसके बाद 1 अप्रैल 2028 से नई बसों पर यह नियम लागू होगा और 2030 तक दोपहिया, तिपहिया, कारें और वाणिज्यिक वाहन, सभी नई गाड़ियों के लिए ईवी अनिवार्य कर दिया जाएगा।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इतने सख्त और तेज बदलाव उपभोक्ताओं और वाहन निर्माताओं दोनों के लिए जोखिम भरे हो सकते हैं। बिना स्पष्ट और दीर्घकालिक रोडमैप के ऐसे फैसले रोजगार, निवेश और पूरे ऑटोमोबाइल इकोसिस्टम पर असर डाल सकते हैं।