अध्ययन से पता चला है कि ADAS से लैस वाहनों के ड्राइवर खाने या फोन का इस्तेमाल करने जैसे ध्यान भटकाने वाले कामों में जल्दी दिलचस्पी लेने लगते हैं, जब ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम एक्टिव होता है। IIHS का दावा है कि उसने वोल्वो के पायलट असिस्ट का इस्तेमाल करने वाले 29 ड्राइवरों और टेस्ला ऑटोपायलट का उपयोग करने वाले 14 ड्राइवरों की निगरानी की है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि ड्राइवरों ने ध्यान भटकने पर अलर्ट देने वाली टाइमिंग को जल्दी से सीख लिया। जिससे टेक्नोलॉजी को धोखा दिया जा सके और वह यह सोचे कि ड्राइवर सड़क पर पूरा ध्यान दे रहे हैं।
शोध के नतीजों के बारे में बताते हुए, IIHS ने कहा कि वोल्वो के पायलट असिस्ट आंशिक ऑटोमेशन सिस्टम का इस्तेमाल करते समय ड्राइवरों द्वारा अपने फोन की जांच करने, खाने या अन्य विजुअल मैनुअल गतिविधियों को करने की संभावना बिना सहायता के ड्राइविंग करने की तुलना में बहुत अधिक थी। इसने यह भी कहा कि जब एजेंसी ने टेस्ला ऑटोपायलट यूजर्स की जांच की, तो अध्ययन में पाया गया कि ऑटोपायलट के साथ प्रति 1,600 किलोमीटर की यात्रा पर शुरुआती अटेंशन रिमाइंडर की दर कुछ महीने के दौरान 26 प्रतिशत बढ़ गई।
इससे पता चला कि जैसे-जैसे ड्राइवर सिस्टम से ज्यादा परिचित होते गए, वे खुद को अधिक विचलित होने दे रहे थे। इन दोनों अध्ययनों में, यह पाया गया कि जब ड्राइवर-सहायता प्रणाली लगी हुई थी, तो ड्राइवर सड़क पर ध्यान नहीं दे रहे थे और वे गैर-ड्राइविंग अन्य गतिविधियां कर रहे थे।
हालांकि ये शोध अमेरिका में किए गए थे, लेकिन यह सिद्धांत दुनिया के अन्य क्षेत्रों की कारों पर भी लागू होता है। ADAS वाली कारों में बढ़ोतरी देखने वाले देश के रूप में भारत भी इसी श्रेणी में आता है।