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फलित ज्योतिष में वक्री गुरु का महत्व

Tue, 12 May 2020 03:15 PM IST
विनोद शुक्ला ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला

सार

  • शनि और शुक्र के बाद गुरु मकर राशि में 14 मई को होगा वक्री
  • देवगुरु बृहस्पति 14 मई की की शाम 07 बजकर 56 मिनट पर 4 माह के लिए वक्री हो रहे हैं
  • गुरु को सृष्टि का आध्यात्मिक ज्ञान प्रदाता कहा गया है
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देवगुरु बृहस्पति 14 मई की की शाम 07 बजकर 56 मिनट पर 4 माह के लिए वक्री हो रहे हैं
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विस्तार
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मई का महीना ज्योतिष के नजरिए से बहुत खास रहा है। मई के महीने में ही कई ग्रहों की चाल वक्री हुई है। 11 मई को शनि अपनी स्वयं की राशि मकर मे वक्री हो गये है जहां यह 29 सितंबर तक रहेंगे। इसके बाद सुख और ऐश्वर्य प्रदान करने वाले शुक्र ग्रह भी 13 मई को वक्री हो जाएगा। 14 मई की शाम 07 बजकर 56 मिनट पर गुरु 4 माह के लिए वक्री हो रहे हैं, ये पुनः 13 सितंबर की सुबह 06 बजकर 10 मिनट पर मार्गी होंगे। आइए जानते हैं ज्योतिष में जब-जब गुरु वक्री होता है तो इसका कैसा प्रभाव पड़ता है।

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Shani Vakri 2020: 11 मई से शनि की उल्टी चाल से किस राशि पर कैसा पड़ेगा असर, जानें यहां

फलित ज्योतिष में वक्री गुरु से तात्पर्य-

- संहिता ज्योतिष के अनुसार किसी भी ग्रह के वक्री होने का अर्थ है, उस ग्रह का अपने ही गंतव्य मार्ग से पुनः वापस लौटना अथवा मार्ग से मुंह फेर लेना प्राणियों को उस ग्रह के मार्गी होने से मिल रही सकारात्मक ऊर्जा का बाधित होना-रुक जाना। 

- गुरु को सृष्टि का आध्यात्मिक ज्ञान प्रदाता कहा गया है, ये ब्रह्मज्ञान, शिक्षण संस्थाओं, भारी उद्योगों, बैंकों, जीवन बीमा निगम जैसी संस्थाओं, गैस के भंडारों, धार्मिक कार्यों, धर्माचार्यों एवं शासन सत्ता के सलाहकारों के कारक हैं। इनके वक्री होने की घटना को व्याहारिक दृष्टि से देखें तो महत्व समझ में आयेगा कि जो व्यक्ति आप को सद्बुद्धि-सन्मार्ग पर ले जाता है वही आप से मुंहफेर ले तो कैसा लगेगा, आप पर क्या गुजरेगी ! बस वक्री का अर्थ यही होता है।

इनके वक्री होने का सर्वाधिक असर संत-महात्माओं पर होता है। उनके चाल-चलन पर आरोप प्रत्यारोप लगने आरम्भ हो जाते हैं, कहीं न कहीं उनकी सामाजिक गरिमा का ह्रास होने लगता है यहाँ तक कि, उन पर हमले होते हुए भी देखा गया है प्राचीन काल में इसी गुरु की वक्री अवस्था में असुर राजाओं द्वारा संत महात्माओं और यज्ञकर्ता वैदिक ब्राह्मणों पर अत्याचार होता रहा है इसलिए इनका वक्री होना इन सबके लिए बेहद अशुभ संकेत है।
 

गुरु द्वारा आत्मबोध का ज्ञान-

- प्राणियों की जन्मकुंडली में बृहस्पति की शुभ स्थानों की स्थिति उन्हें आत्मबोध की ज्योति प्रदान करती है अतः इनका वक्री होना, उच्च राशि अथवा नीचराशिगत होना, स्वगृही, मित्रगृही, दृष्टि सम्बन्ध आदि सब जीवन के अति महत्व पूर्ण अंग हैं। ये जब मार्गी रहते हैं तो बुद्धि को सुचारू रूप से सही दिशा में चलाते है किन्तु वक्री होने पर मन-मस्तिस्क में भय-भ्रम और विषाद पैदा कर देते हैं।

- जिनकी कुंडली में गुरु अशुभ भाव में हों अथवा अशुभ राशि में गोचर कर रहे हों वे इस अवधि में अधिक परेशान होंगे, क्योंकि अशुभ गुरु के समय व्यक्ति भावावेश में कई ऐसे निर्णय ले लेता है जो स्वयं उसी के लिए आत्मघाती सिद्ध होते हैं। यहाँ तक कि सरकारें भी न्याय और नितिपरक निर्णय लेने में असमर्थ हो जाती हैं मंत्रिमंडल में अधिकतर फेरबदल अथवा विस्तार ऐसी ही अवधि में होते हैं। सभी राशि वालों के लिए यह समय अति सूझ-बूझ और सावधानी बरतने का है, अतः संयम से काम और निर्णय लें।
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गुरु के अशुभ प्रभावों से बचने के उपाय-

अशुभ गुरु की शांति के लिए ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः, मंत्र का जप करना तथा गुरुवार के दिन पीले वस्त्र धारण करना उत्तम रहेगा। बृहस्पति का ही गायत्री मंत्र ॐ अंगिरो जाताय विद्महे वाचस्पतये धीमहि तन्नो गुरु प्रचोदयात्। का जप हर तरह की गुरुजन्य परेशानियों से मुक्ति देगा। पञ्चपल्लव जिनमें आप, पाकड़, पीपल, गूलर तथा बरगद के वृक्षों का आरोपण करने के साथ साथ गुरु के प्रिय वृक्ष नीम, अनार और कनेर के वृक्षों का रोपण करना भी आपके संकल्प सिद्धि में सहायता करेगा।
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