सभी नौ ग्रहों में एक बृहस्पति ग्रह का हमारे जीवन में बहुत ज्यादा प्रभाव माना गया है। इसका कारण भी है, कुंडली में गुरु का स्थान 5, 9 और 12वां भाव में होता है। पांचवें भाव का स्वामी ग्रह सूर्य होते हैं और कारक ग्रह गुरु हैं। नौवें भाव का स्वामी ग्रह गुरु होता हैं और कारक भी गुरु ही हैं। बारहवें भाव का स्वामी गुरु होते हैं और कारक राहु हैं। तीन भावों का इस ग्रह का शासन है। धनु और मीन राशि के स्वामी बृहस्पति ग्रह मकर में उच्च और कर्क में नीच के होते हैं। यह हमारे जीवन में आयु और सुख-समृद्धि को संचालित करते हैं।
राशियों में गुरु का प्रभाव :
मेष : इस राशि में गुरु हैं तो जातक वकील, वादी, ऐश्वर्यशाली, तेजस्वी, प्रसिद्ध, कीर्तिमान और विजयी होगा।
वृषभ : इस राशि में हैं तो जातक को धार्मिक, बलवान शरीर, धनवान, सदाचारी, चिकित्सक और बुद्धिमान बनाएंगे।
मिथुन : इस राशि में हैं तो जातक को वैज्ञानिक, लेखक, लोकप्रिय और व्यवहार कुशल बनाएंगे।
कर्क : इस राशि में हैं तो जातक को सुधारक, सदाचारी, नेता, सुखी और धनी बनाएंगे।
सिंह : इस राशि में हैं तो जातक को शत्रुजीत, कार्यकुशल, प्रेमी और धार्मिक बनाएंगे।
कन्या : इस राशि में हैं तो जातक को चंचल, भोगी, कला निपुण, सुखी और विलासी बनाएंगे।
तुला : इस राशि में है तो जातक को व्यापार कुशल, बुद्धिमान, लेखक, संपादक, पुत्रवान और सुखी बनाएंगे।
वृश्चिक : इस राशि में हैं तो जातक को राजनीतिज्ञ, कार्य कुशल और पुण्यात्मा बनाएंगे।
धनु : इस राशि में हैं तो जातक को धर्माचार्य, दंभी, धूर्त, राति प्रेमी बनाएंगे।
मकर : इस राशि में हैं तो जातक को प्रवासी, व्यर्थ परिश्रमी, चंचल और धूर्त बनाएंगे।
कुंभ : इस राशि में हैं तो जातक को भयभीत, कपटी और रोगी बनाएंगे।
मीन : इस राशि में हैं तो जातक को लेखक, शास्त्रज्ञ, राज्यमान्य, शांतचित्त, दयालु और व्यवहार कुशल बनाएंगे।
कुंडली के भावों में गुरु का प्रभाव :
पहला भाव : गद्दी पर बैठा साधु, राजगुरु या मठाधीश मानो। जैसे-जैसे शिक्षा बढ़ेगी दौलत भी बढ़ती जाएगी। बुरे कार्यों से दौलत का असर खत्म, लेकिन अपने हुनर से प्रसिद्ध पा लेगा। ऐसे व्यक्ति का भाग्य दिमागी ताकत या ऊंचे लोगों के साथ रहने से बढ़ता है। यदि चंद्रमा अच्छी हालत में है तो उम्र के साथ सुख और समृद्धि बढ़ती जाएगी।
सावधानी : यदि शनि पांचवें घर में हो तो खुद का मकान न बनाएं और नौवें घर में है तो सेहत का ध्यान रखें। राहु आठवें या ग्यारहवें घर में हो तो पिता का ध्यान रखें।
दूसरा भाव : जगतगुरु होगा जो सबको तार देगा। यदि केतु छठे भाव में है तो ऐसे व्यक्ति को अपनी मौत का पता पहले ही चल जाएगा। पत्नी सुंदर होगी। यदि सूर्य दसवें में हो तो प्रसिद्धि प्राप्त करेगा।
सावधानी : सूर्य से संबंधित कोई भी काम न करें।
तीसरा भाव : खानदान का रखवाला और गुरु का गुरु समझो। रहस्यमय विद्याओं में रुचि लेता है। दौलत आती-जाती रहती है। आचरण का अच्छा होगा तो स्थाई दौलत रहेगी।
सावधानी : भाई और बहनों से अच्छे संबंध बनाकर रखें। दुर्गा मां की पूजा करें और कन्याओं को भोजन कराते रहें।
चौथा भाव : पानी में तैरता ज्ञान। स्त्री, दौलत और माता का सुख। खुद का आलीशान बंगला होगा। यहां यदि गुरु उच्च का है तो लोकप्रिय बनेगा।
सावधानी : दसवें घर में गुरु के शत्रु ग्रह हैं तो सावधानी बरतें। बदनामी हो सकती है। बहन, पत्नी और मां का सम्मान करें।
पांचवां भाव : सम्मानित लोगों के बीच बैठा विशिष्ट व्यक्ति ब्रह्मज्ञानी कहलाता है। इसकी इज्जत ही इसकी दौलत है। जरा सी बात पर क्रोधित होने वाले इस जातक का कोई मुकाबला नहीं कर सकता। कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति के यहां यदि बृहस्पति के दिन पुत्र हो तो छुपे हुए भाग्य का खजाना खुल जाएगा। सभी जन्मों के पाप कट जाएंगे।
सावधानी : पुत्र ही दौलत और सुख-शांति है इसलिए उसे दु:खी करके जीवन को नरक न बनाएं। यदि अशुभ केतु ग्यारहवें घर में हो तो औलाद से या औलाद के धन से उसे सुख नहीं मिल सकता इसके लिए धर्म के नाम पर कभी किसी से कुछ भी न मांगे और न ही दें।
छठा भाव : मुफ्तखोर साधु समझो। ऐसे जातक को कई चीजें बिना मांगे या बिना परिश्रम के ही मिल जाती है यह अलग बात है कि वह इसकी कदर करता है या नहीं। यदि शनि शुभ हो तो आर्थिक हालात ठीक रहेगी। इस जगह बृहस्पति यदि अशुभ हो तो समझो कि बस जैसे-तैसे आम जरूरतें पूरी होती रहेंगी। केतु बारहवें में बैठा शुभ हो तो ही दौलतमंद बन सकता है।
सावधानी : लापरवाही और आलस्य को त्याग कर परिश्रम से कमाएं पर ही गुजारा करें। प्राप्त चीजों की कदर करें। बहन, मौसी, बुआ से अच्छा व्यवहार रखें।
सातवां भाव : बनना तो था साधु लेकिन फंस गए गृहस्थी में। अब यदि आराम पसंद रहेगा तो जीवन में हर बार असफलता की ही मुंह देखना पड़ेगा। यदि बृहस्पति शुभ है तो ससुराल से मिली दौलत बरकत देगी।
सावधानी : घर में मंदिर रखना या बनाना अर्थात परिवार की बर्बादी। कपड़ों का दान करना वर्जित। पराई स्त्री से संबंध न रखें।
आठवां भाव : ऐसा जाक समझो कि श्मशान में बैठा साधु है। यदि आचरण सही है तो मुश्किल के दौर में सभी देवताओं का तुरंत ही सहयोग मिलेगा। सोना पहनना शुभ होगा। गुप्त विद्या को जानने का शौक होगा। दूसरे भाव में बृहस्पति के मित्र ग्रह बैठे हों तो जंगल में भी मंगल होगा।
सावधानी : बृहस्पति के पक्के घरों में उसके शत्रु ग्रह हों तो उपाय करें। जैसे बृहस्पति वार करें, पीली वस्तुएं दान करें, नाक सूखी रखें और पीला तिलक लगाएं।
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नौवां भाव : धन और दौलत का त्याग करने वाला योगी। इसका मतलब यह है कि ऐसा व्यक्ति कभी भी धन के पीछे नहीं भागेगा। खानदानी अमीर होगा। फिर भी अपनी मेहनत से बहुत फिर भी अपनी मेहनत से बहुत धन कमा सकने की ताकत रखेगा।
सावधानी : धर्म विरुद्ध आचरण बर्बादी का कारण बन सकता है।
दसवां भाव : घर की जिम्मेदारी से बचकर भागने वाला या कहें कि ऐसा गृहस्थ जो बच्चों को अकेला छोड़कर चला जाए। यदि शनि अच्छी स्थिति में हो तो शुभ फल देगा। चौथे घर में शत्रु ग्रह हो तो अशुभ।
सावधानी : ईश्वर और भाग्य पर भरोसा न करें। परिश्रम और कर्म हो ही अपनाएं। शादी के बाद किसी भी दूसरी स्त्री से संबंध न रखें अन्यथा सब कुछ बर्बाद। यदि शनि 1, 10, 4 में हो तो किसी को खाने या पीने की कोई भी वस्तु न दें। घर में मंदिर न बनाएं।
ग्यारहवां भाव : यहां इसे खजूर का अकेला दरख्त कहा गया है। यदि आचरण सही नहीं है तो ऐसे व्यक्ति की अर्थी ससम्मान नहीं निकल पाती। यहां बृहस्पति अच्छा न्याय नहीं कर पाता है। पिता के भाग्य से ही खुद का जीवन चलता है। पिता के जाने के बाद सब कुछ नष्ट।
सावधानी : परोपकार और गरीबों की मदद करने के अवसर को न चुकें। धर्म के प्रति अविश्वास प्रकट न करें। पिता का अपमान न करें। वादाखिलाफी करने से नुकसान होगा। रिश्तेदारों से बना कर रखें।
बारहवां भाव: ज्ञानी तो होगा लेकिन लेकिन बैरागी होगा। धार्मिक विश्वास और संध्या वंदन को कायम करने से भाग्य जागृत रहेगा। बैरागी बनकर रहने से अच्छा है कि जिम्मेदारी को समझना होगा।
सावधानी : गले में माला न पहने। वृक्ष काटने का काम न करें। गुरु या साधु का अपमान न करें। बहुत ज्यादा बोले नहीं। वाणी पर संयम रखकर ही उत्तर दें।
उपाय : गुरुवार का व्रत रखें। नाक साफ रखें। पीले फूल वाले पौधे गृह वाटिका में लगाएं। पवित्र और प्रसन्नचित्त रहें। इसके अलावा चाहें तो पीला वस्त्र, फल, फूल आदि दान करें। पीपल की जड़ में नित्य जल चढ़ाएं।