ईश्वर ने इस संसार को देखने के लिए हमें आंखे दी हैं और इनके बिना मनुष्य का जीवन अधूरा सा लगता है। इस अनुपम और रोमांच से भरी हुई प्रकृति को हम अपनी आंखों से ही देख पाते हैं, लेकिन कई बार मनुष्य को आंखों से जुड़े विकार हो जाते हैं जैसे नज़र की कमजोरी या मोतियाबिंद जैसी बीमारी। ऐसे में आज इस लेख में हम समझने की कोशिश करेंगे कि नेत्र रोग के पीछे कौन से कारक जिम्मेदार है।
ज्योतिष में सूर्य और चंद्र को नेत्र की रक्षा करने वाला कहा गया है। क्योंकि ये दो ग्रह हमें रोशनी देते हैं। हमारी आंखों में सूर्य और चंद्र से प्रभावित होने वाले तत्व है इसलिए जब ये तत्व विकार युक्त हो जाए तो रोग होता है। कालपुरुष की कुंडली में दूसरे भाव से दायीं आंख का और बारहवें भाव से बायीं आंख का विचार किया जाता है, इसलिए किसी भी कुंडली के इन दो भावों का विश्लेषण भी जरूरी है।
ज्योतिष में छठे भाव से रोग का विचार किया जाता है और ऐसे में जब सूर्य चंद्र शत्रु रूप में और रोगकारक ग्रह मिलकर इस भाव को प्रभावित करते हैं तो जातक को आंख में समस्या होने लगती है। सूर्य, चंद्र, द्वितीयेश और द्वादशेश जब पीड़ित हो जाते है तो जातक की आंख में विकार होते हैं। इन योगों में अगर केतु भी शामिल हो तो जातक की सर्जरी भी हो सकती है।
उदाहरण के लिए कुम्भ लग्न में दूसरे भाव के स्वामी गुरु हैं। छठे के स्वामी चंद्र हैं और सूर्य मारकेश हैं। शनि बारहवें भाव के स्वामी होने के कारण इस योग में अपनी भूमिका निभाते हैं। अब अगर शनि छठे भाव में गुरु से युति करे या बारहवें भाव में चन्द्रमा के साथ युति करे तो जातक के नेत्र में पीड़ा हो सकती है। अगर इसी लग्न में सूर्य राहु से युत होकर दूसरे या आठवें भाव में हो जातक को आंखो का ऑपरेशन करवाना पड़ सकता है।