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Guru Gochar 2025: गुरु का कर्क राशि में गोचर, जानिए मेष राशि वालों पर प्रभाव

Sun, 12 Oct 2025 04:21 PM IST
विनोद शुक्ला ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला

सार

Guru Gochar 2025: देवगुरु बृहस्पति आपकी कुंडली के नवम और द्वादश भाव के स्वामी होते हैं और अब गुरु का कर्क राशि में गोचर आपके चौथे भाव में होगा। कर्क राशि में गुरु उच्च के होते हैं जिसके कारण आपको अच्छे परिणाम की प्राप्ति हो सकती है।
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Guru Gochar 2025: कर्क राशि में गोचर का प्रभाव - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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Guru Gochar 2025: वैदिक ज्योतिष शास्त्र में देवगुरु बृहस्पति को शुभ ग्रह माना जाता है। यह एक राशि में करीब एक वर्ष तक रहते हैं फिर इसके बाद दूसरी राशि में गोचर करने वाले हैं। इस वर्ष देवगुरु बृहस्पति अतिचारी होकर मिथुन राशि में प्रवेश किया है। अतिचारी होने से गुरु की चाल तेज जो जाती है। इस वजह से ये इस वर्ष तीन बार राशि परिवर्तन करेंगे। आपको बता दें कि सबसे पहले 15 मई 2025 को गुरु वृषभ राशि में थे, फिर 15 मई से लेकर 19 अक्तूबर तक मिथुन राशि में गोचर करेंगे। इसके बाद देवगुरु बृहस्पति 19 अक्तूबर को कर्क राशि में प्रवेश कर जाएंगे। गुरु कर्क राशि में रहते हुए 11 नवंबर को वक्री हो जाएंगे फिर वक्री अवस्था में 4 नवंबर को फिर से मिथुन राशि में वापस लौट आएंगे। आइए जानते हैं गुरु के राशि परिवर्तन करने से मेष राशि वालों पर किस तरह का प्रभाव पड़ेगा आइए जानते हैं।
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मेष राशि पर गुरु ग्रह प्रभाव
देवगुरु बृहस्पति आपकी कुंडली के नवम और द्वादश भाव के स्वामी होते हैं और अब गुरु का कर्क राशि में गोचर आपके चौथे भाव में होगा। कर्क राशि में गुरु उच्च के होते हैं जिसके कारण आपको अच्छे परिणाम की प्राप्ति हो सकती है। मानसिक शांति की प्राप्ति होगी। इसके अलावा जो लोग विदेश में कारोबार या फिर किसी तरह कोई काम करते हैं उनके लिए अनुकूल परिणाम की प्राप्त हो सकती है। पुरानी परेशानयों से छुटकारा मिलेगा। जमीन के मामलों में छोटी-मोटी परेशानियां दूर होंगी।  बृहस्पति का यह गोचर यात्रा के योग बना रहा है।  
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वैदिक ज्योतिष में देवगुरु बृहस्पति का महत्व
- वैदिक ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति को गुरु का दर्जा प्राप्त है। 
- गुरु धनु और मीन राशि के स्वामी होते हैं। 
- कर्क राशि में गुरु उच्च के होते हैं जबकि मकर राशि में नीच के होते हैं। 
- गुरु बृहस्पति को तीन विशेष द्दष्टियां प्राप्त है। पांचवी, सातवीं और नौवीं द्दष्टि।
- वैदिक ज्योतिष में गुरु बड़े भाई, शिक्षा, धन, संतान, ज्ञान और शिक्षा के कारक होते हैं। 
- गुरु बृहस्पति पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रों के स्वामी होते हैं। 
- जिन जातकों की कुंडली के पहले भाव यानी लग्न में गुरु स्वयं बैठ जाएं तो व्यक्ति बहुत ही भाग्यशाली और ज्ञानी होता है। 
- कालपुरुष की कुंडली में गुरु नौवें और बारहवें भाव के स्वामी होते हैं और यह दूसरे, पांचवें, नौवें,दसवें और ग्यारहवें भाव के कारक होते है। 
- गुरु के दूसरे भाव में यानी धन के भाव में होने पर जातक बहुत धनी और समृद्धिशाली रहता है। 
-जब गुरु कुंडली के पांचवें भाव में होते हैं या फिर पाचवें भाव पर द्दष्टि डालते हैं तो जातक को उच्च शिक्षा और गुणी संतान की प्राप्ति होती है। 
- नवम भाव में गुरु के होने पर व्यक्ति शिक्षा और ज्ञान में परांगत होता है। कुंडली का दशम भाव कार्यक्षेत्र, करियर या पेशे का होता है दशम में गुरु हो तो व्यक्ति समाज में खूब प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाला होता है। 
- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली का ग्यारहवां भाव आय और लाभ का होता है। गुरु के इस भाव में होने पर जातक बहुत धन अर्जित करने में कामयाब होता है। 
- गुरु के कमजोर होने पर जातक को लीवर, किडनी, मधुमेह, पीलिया, मोटापा और कैंसर जैसी बीमारी होने का खतरा रहता है। 
- गुरु का रत्न पुखराज होता है। केले के वृक्ष को गुरु के रूप में पूजा जाता है। बृहस्पति गुरु पीले रंग का प्रतिनिधित्व करते हैं।

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