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Guru Gochar 2025: देवगुरु बृहस्पति का मिथुन राशि में गोचर, जानिए मेष राशि पर कैसा रहेगा प्रभाव ?

Tue, 02 Dec 2025 03:46 PM IST
विनोद शुक्ला ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला

सार

Guru Gochar 2025: मेष राशि वालों के लिए देवगुरु बृहस्पति नवें और बारहवें भाव के स्वामी होते हैं और 04 दिसंबर से यह आपके तीसरे भाव में गोचर करने जा रहे हैं। इससे मेष राशि वाले आलसी हो सकते हैं और कामों को आगे के दिनों के लिए टाल सकते हैं।
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Guru Gochar 2025 - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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Guru Gochar 2025: देवगुरु बृहस्पति अब मिथुन राशि में प्रवेश कर चुके हैं। वैदिक ज्योतिष शास्त्र में देवगुरु बृहस्पति को धन, सुख-समृद्धि, विवाह, बुद्धि और विस्तार का कारक ग्रह माना जाता है। 04 दिसंबर 2025 को रात 08 बजकर 39 मिनट पर देवगुरु बृहस्पति बुध के स्वामित्व वाली राशि मिथुन में गोचर कर चुके हैं। बुध को तटस्थ और गुरु को शुभ ग्रह माना जाता है। गुरु के मिथुन राशि में गोचर करने से इसका सभी 12 राशियों के जातकों पर प्रभाव पड़ता है। ऐसे में आइए जानते है गुरु के मिथुन राशि में वक्री अवस्था में गोचर करने से मेष राशि के जातकों पर किस तरह का प्रभाव पड़ेगा। 

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मेष राशि पर गुरु के गोचर का प्रभाव
मेष राशि वालों के लिए देवगुरु बृहस्पति नवें और बारहवें भाव के स्वामी होते हैं और 04 दिसंबर से यह आपके तीसरे भाव में गोचर करने जा रहे हैं। इससे मेष राशि वाले आलसी हो सकते हैं और कामों को आगे के दिनों के लिए टाल सकते हैं। कार्यक्षेत्र में अड़चनों का सामना आपको करना होगा। इस दौरान आपके कार्यों में देर हो सकती है। साहस में कमी का सामना करना हो सकता है। करियर में आपको जल्दबाजी में फैसला लेने से आपको बचना होगा। व्यापार में आपके लिए मिलाजुली स्थिति का सामना करना होगा। इस दौरान दांपत्य जीवन में तनाव देखने को मिल सकता है और सेहत संबंधी मामलों में संभलकर रहना होगा।

ज्योतिष में गुरु ग्रह का महत्व
- वैदिक ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति को गुरु का दर्जा प्राप्त है। 
- गुरु धनु और मीन राशि के स्वामी होते हैं। 
- कर्क राशि में गुरु उच्च के होते हैं जबकि मकर राशि में गुरु नीच के होते हैं। 
- गुरु बृहस्पति को तीन विशेष द्दष्टियां प्राप्त है। पांचवी, सातवीं और नौवीं द्दष्टि।
- वैदिक ज्योतिष में गुरु बड़े भाई, शिक्षा, धन, संतान, ज्ञान और शिक्षा के कारक होते हैं। 
- गुरु बृहस्पति पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रों के स्वामी होते हैं। 
- जिन जातकों की कुंडली के पहले भाव यानी लग्न में गुरु स्वयं बैठ जाएं तो व्यक्ति बहुत ही भाग्यशाली और ज्ञानी होता है। 
- कालपुरुष की कुंडली में गुरु नौवें और बारहवें भाव के स्वामी होते हैं और यह दूसरे, पांचवें, नौवें,दसवें और ग्यारहवें भाव के कारक होते है। 
- गुरु के दूसरे भाव में यानी धन के भाव में होने पर जातक बहुत धनी और समृद्धिशाली रहता है। 
-जब गुरु कुंडली के पांचवें भाव में होते हैं या फिर पाचवें भाव पर द्दष्टि डालते हैं तो जातक को उच्च शिक्षा और गुणी संतान की प्राप्ति होती है। 
- नवम भाव में गुरु के होने पर व्यक्ति शिक्षा और ज्ञान में परांगत होता है। कुंडली का दशम भाव कार्यक्षेत्र, करियर या पेशे का होता है दशम में गुरु हो तो व्यक्ति समाज में खूब प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाला होता है। 
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- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली का ग्यारहवां भाव आय और लाभ का होता है। गुरु के इस भाव में होने पर जातक बहुत धन अर्जित करने में कामयाब होता है। 
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- गुरु के कमजोर होने पर जातक को लीवर, किडनी, मधुमेह, पीलिया, मोटापा और कैंसर जैसी बीमारी होने का खतरा रहता है। 
- गुरु का रत्न पुखराज होता है। केले के वृक्ष को गुरु के रूप में पूजा जाता है। बृहस्पति गुरु पीले रंग का प्रतिनिधित्व करते हैं।

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