देवगुरु बृहस्पति अब कर्क राशि में संचरण कर रहे हैं, जो 3 दिसंबर तक इसी राशि में रहेंगे। फिर इसके बाद मिथुन राशि में वक्री होकर प्रवेश करेंगे। गुरु अभी मार्गी हैं और यह 12 नवंबर को वक्री हो जाएंगे। वक्री होने का मतलब पीछे की ओर चलना और मार्गी होने का मतलब आगे की तरफ चलना है। कर्क राशि में गुरु उच्च के होते हैं। गुरु के कर्क राशि में गोचर होने से मीन राशि में स्थिति शनि के ऊपर इनकी द्दष्टि बनी रहेगी। गुरु के कर्क राशि में गोचर होने से आइए जानते हैं वृषभ राशि के जातकों पर किस तरह का प्रभाव पड़ेगा इसका ज्योतिषीय विश्लेषण करते हैं।
Saptahik Rashifal (13 -19 October): मिथुन समेत इन राशि के जातकों को बरतनी होगी सावधानी, पढ़ें साप्ताहिक राशिफल
वृषभ राशि पर गुरु गोचर का प्रभाव
देवगुरु बृहस्पति आपकी कुंडली के आठवें और और ग्याहरवें भाव के स्वामी होते हैं। 19 अक्तूबर को देवगुरु बृहस्पति का कर्क राशि में गोचर आपके तीसरे भाव में होगा। तीसरे भाव में देवगुरु का गोचर अच्छा नहीं माना जाता है। इससे आपको इस दौरान शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। इस दौरान जरूरी कामों में कुछ अड़चनों का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन वहीं दूसरी तरफ लग्न भाव के स्वामी का उच्च का होना आपके आर्थिक गतिविधियों को सकारात्मक परिणाम देने वाला साबित हो सकता है। इस दौरान आपको जल्द बाजी में कोई भी निर्णय लेने से बचना होगा।
Atichari Guru 2025: 09 दिन बाद अतिचारी गुरु करेंगे उच्च राशि में गोचर, इन राशियों को मिलेगा धन-संपत्ति का लाभ
वैदिक ज्योतिष में देवगुरु बृहस्पति का महत्व
- वैदिक ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति को गुरु का दर्जा प्राप्त है।
- गुरु धनु और मीन राशि के स्वामी होते हैं।
- कर्क राशि में गुरु उच्च के होते हैं जबकि मकर राशि में नीच के होते हैं।
- गुरु बृहस्पति को तीन विशेष द्दष्टियां प्राप्त है। पांचवी, सातवीं और नौवीं द्दष्टि।
- वैदिक ज्योतिष में गुरु बड़े भाई, शिक्षा, धन, संतान, ज्ञान और शिक्षा के कारक होते हैं।
- गुरु बृहस्पति पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रों के स्वामी होते हैं।
- जिन जातकों की कुंडली के पहले भाव यानी लग्न में गुरु स्वयं बैठ जाएं तो व्यक्ति बहुत ही भाग्यशाली और ज्ञानी होता है।
- कालपुरुष की कुंडली में गुरु नौवें और बारहवें भाव के स्वामी होते हैं और यह दूसरे, पांचवें, नौवें,दसवें और ग्यारहवें भाव के कारक होते है।
- गुरु के दूसरे भाव में यानी धन के भाव में होने पर जातक बहुत धनी और समृद्धिशाली रहता है।
-जब गुरु कुंडली के पांचवें भाव में होते हैं या फिर पाचवें भाव पर द्दष्टि डालते हैं तो जातक को उच्च शिक्षा और गुणी संतान की प्राप्ति होती है।
- नवम भाव में गुरु के होने पर व्यक्ति शिक्षा और ज्ञान में परांगत होता है। कुंडली का दशम भाव कार्यक्षेत्र, करियर या पेशे का होता है दशम में गुरु हो तो व्यक्ति समाज में खूब प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाला होता है।
- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली का ग्यारहवां भाव आय और लाभ का होता है। गुरु के इस भाव में होने पर जातक बहुत धन अर्जित करने में कामयाब होता है।
- गुरु के कमजोर होने पर जातक को लीवर, किडनी, मधुमेह, पीलिया, मोटापा और कैंसर जैसी बीमारी होने का खतरा रहता है।
- गुरु का रत्न पुखराज होता है। केले के वृक्ष को गुरु के रूप में पूजा जाता है। बृहस्पति गुरु पीले रंग का प्रतिनिधित्व करते हैं।