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Guru Gochar 2025: देवगुरु बृहस्पति का गोचर, जानिए कर्क राशि पर किस तरह पड़ेगा प्रभाव

Sun, 26 Oct 2025 10:02 PM IST
विनोद शुक्ला ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला

सार

Guru Gochar 2025:  देवगुरु बृहस्पति कर्क राशि वालों की कुंडली में छठे और नवम भाव के स्वामी होते हैं। 19 अक्टूबर को गुरु का कर्क राशि में गोचर से यह आपके पहले भाव में गोचर हुए हैं।
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Guru Gochar 2025: गुरु को शुभ, अच्छा फल देने वाला और एक सौम्य ग्रह माना जाता है। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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Guru Gochar 2025: वैदिक ज्योतिष शास्त्र में गुरु ग्रह का विशेष महत्व होता है। गुरु ग्रह को शुभ ग्रह माना जाता है और कुंडली में गुरु ग्रह की अच्छी स्थिति होने पर जातक के जीवन में किसी भी तरह की धन और मान-सम्मान की कोई भी कमी नहीं होती। गुरु एक राशि में करीब 13 महीनों तक रहते हैं। ऐसे में गुरु की चाल, दशा और राशि में बदलाव होने पर देश-दुनिया के साथ-साथ सभी 12 राशियों के जातकों पर इसका विशेष प्रभाव पड़ता है। गुरु वैसे तो 13 महीनों में राशि बदलते लेकिन इस वर्ष अतिचारी होने के वजह से दो बार राशि बदल चुके हैं। आपको बता दें कि गुरु 19 अक्तूबर को मिथुन से कर्क राशि में आ गए हैं। कर्क राशि में गुरु उच्च के होते हैं। आइए जानते हैं गुरु के गोचर करने से कर्क राशि पर किस तरह का प्रभाव पड़ेगा इसका ज्योतिषीय विश्लेषण करते हैं। 
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कर्क राशि पर गुरु गोचर का प्रभाव
देवगुरु बृहस्पति कर्क राशि वालों की कुंडली में छठे और नवम भाव के स्वामी होते हैं। 19 अक्टूबर को गुरु का कर्क राशि में गोचर से यह आपके पहले भाव में गोचर हुए हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पहले भाव में गुरु का गोचर अच्छे परिणाम नहीं देते हैं। लेकिन पहले की तुलना में गुरु का गोचर आपके लिए सफलता के द्वार खोलेंगे। भाग्य के स्वामी का उच्च अवस्था में पहले भाव में आने से आपके भाग्य को बल मिलेगा। मान-सम्मान में इजाफा देखने को मिलेगा। इस दौरान आपको जल्दबाजी में निर्णय करने से बचना होगा। धन लाभ होने के प्रबल संकेत हैं। 
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वैदिक ज्योतिष में देवगुरु बृहस्पति का महत्व
- वैदिक ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति को गुरु का दर्जा प्राप्त है। 
- गुरु धनु और मीन राशि के स्वामी होते हैं। 
- कर्क राशि में गुरु उच्च के होते हैं जबकि मकर राशि में नीच के होते हैं। 
- गुरु बृहस्पति को तीन विशेष द्दष्टियां प्राप्त है। पांचवी, सातवीं और नौवीं द्दष्टि।
- वैदिक ज्योतिष में गुरु बड़े भाई, शिक्षा, धन, संतान, ज्ञान और शिक्षा के कारक होते हैं। 
- गुरु बृहस्पति पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रों के स्वामी होते हैं। 
- जिन जातकों की कुंडली के पहले भाव यानी लग्न में गुरु स्वयं बैठ जाएं तो व्यक्ति बहुत ही भाग्यशाली और ज्ञानी होता है। 
- कालपुरुष की कुंडली में गुरु नौवें और बारहवें भाव के स्वामी होते हैं और यह दूसरे, पांचवें, नौवें,दसवें और ग्यारहवें भाव के कारक होते है। 
- गुरु के दूसरे भाव में यानी धन के भाव में होने पर जातक बहुत धनी और समृद्धिशाली रहता है। 
-जब गुरु कुंडली के पांचवें भाव में होते हैं या फिर पाचवें भाव पर द्दष्टि डालते हैं तो जातक को उच्च शिक्षा और गुणी संतान की प्राप्ति होती है। 
- नवम भाव में गुरु के होने पर व्यक्ति शिक्षा और ज्ञान में परांगत होता है। कुंडली का दशम भाव कार्यक्षेत्र, करियर या पेशे का होता है दशम में गुरु हो तो व्यक्ति समाज में खूब प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाला होता है। 
- ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली का ग्यारहवां भाव आय और लाभ का होता है। गुरु के इस भाव में होने पर जातक बहुत धन अर्जित करने में कामयाब होता है। 
- गुरु के कमजोर होने पर जातक को लीवर, किडनी, मधुमेह, पीलिया, मोटापा और कैंसर जैसी बीमारी होने का खतरा रहता है। 
- गुरु का रत्न पुखराज होता है। केले के वृक्ष को गुरु के रूप में पूजा जाता है। बृहस्पति गुरु पीले रंग का प्रतिनिधित्व करते हैं।


 
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