यदि मंगल चतुर्थ भाव में हों तो माता-पिता को सुख से वंचित रखता है उसे परिजनों के विरोध का भी सामना करना पड़ता है किंतु स्वगृही अथवा उच्च राशि का मंगल मांगलिक दोष नष्ट करके अति शुभ फलदाई हो जाता है। सप्तम भाव में मंगल के द्वारा बनाए गए मांगलिक दोष का अति सूक्ष्मता के साथ विवेचन करना चाहिए क्योंकि मंगल कारक अथवा शत्रु राशि में होंगे तो जातक के लिए दो विवाह की प्रबल संभावना बनाएंगे यहां भी यदि ये स्वगृही या उच्च राशिगत हों तो जातक सभी सुख प्रदान करते हैं।
अष्टम भाव में स्वगृही अथवा उच्चराशि का मंगल उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु देता है किंतु नीच राशि अथवा शत्रु राशिगत होने पर दांपत्य जीवन में दुख और धन हानि की संभावना बढ़ा देता है और सिंह राशिगत मंगल कठोर वचन बोलने वाला जीवन साथी देता है। द्वादश भाव में मंगल दांपत्य जीवन में कटुता तथा धन नाश का संकेत देता है ऐसा जातक अपने ही कर्मों द्वारा अपना नुकसान उठाता है। स्वगृही अथवा उच्च का होने पर भी ये जातक को अति महत्वाकांक्षी बना देता है ऐसा व्यक्ति पथभ्रष्ट भी हो सकता है। इसलिए मांगली की जन्मकुंडली ऊपर गहन चिंतन की परम आवश्यकता रहती है।
दोगुनी मांगलिक दोष वाली जन्मपत्रिका जब मंगल अपने मांगलिक दोष का निर्माण करने वाले भावों में हों साथ ही नीचराशिगत हों अथवा इनके साथ कोई भी पाप ग्रह बैठा हो तो वह जन्म कुंडली दोगुनी मांगलिक दोष वाली हो जाती है जिसका दुष्प्रभाव बढ़ा हो जाता है अतः अति विवेचन के बाद ही मांगलिक जन्म कुंडलियों को विवाह के लिए चिंतन करना चाहिए।
मांगलिक दोष का सहज परिहार यदि पुरुष की जन्मकुंडली मांगलिक हो और स्त्री की जन्मकुंडली में उन्हीं मांगलिक वाले भावों में थे किसी में भी सूर्य हो तो जन्मपत्रिका मांगलिक दोष से मुक्त हो जाती है और विवाह उत्तम रहता है। इसी प्रकार मेष राशि गत मंगल लग्न में, वृश्चिक राशि का चतुर्थ भाव में, वृषभ राशि के सप्तम भाव में, कुंभ राशि के अष्टम भाव में तथा धनु राशि के बारहवें भाव में हो तो मांगलिक दोष नहीं होता। यदि वृहस्पति उच्च राशिगत होकर लग्न में हो तो भी मांगलिक दोष परिहार हो जाता है।
जिन भाव में मंगल के बैठने से कुंडली मांगलिक मानी जाती है यदि उन्हीं भाव में से किसी में भी शनि बैठे हों तो भी मांगलिक दोष परिहार हो जाता है और वह विवाह शुभ माना जाता है। यदि केंद्र और त्रिकोण भाव में शुभ ग्रह हों तथा तीसरे, छठे और ग्यारहवें भाव में अशुभ ग्रह हों और सप्तमेश सप्तम भाव में हो तो भी मांगलिक दोष का परिहार हो जाता है। यदि सातवें भाव में मंगल हो और उन पर वृहस्पति की दृष्टि पड़ रही हो तो भी मांगलिक दोष का परिहार हो जाता है।
यदि बृहस्पति और मंगल एक साथ हो या चंद्रमा केंद्र स्थान में हो तो भी मांगलिक दोष नष्ट हो जाता है। मांगलिक भाव में यदि मंगल चर राशि में हो तो भी मांगलिक दोष का परिहार माना जाता है। कुंडली में मांगलिक कहलाने वाले भाव में यदि किसी भी कुंडली में चाहे वह वर की हो या कन्या की हो, सूर्य, शनि, राहु और केतु में से कोई भी ग्रह हैं तो मांगलिक दोष समाप्त हो जाता है।