कथा के अनुसार एक बार स्वर्ग के राजा इन्द्र ऐरावत हाथी पर सवार होकर कहीं जा रहे थे। तभी उन्हें रास्ते में दुर्वासा ऋषि मिले। उनके गले में एक माला पड़ी थी। उन्होंने वह माला अपने गले से उतार कर इन्द्र के ऊपर फेंक दी। लेकिन इन्द्र ने उस माला को अपने हाथी ऐरावत के गले में डाल दिया। उस माला से तीव्र गंध आ रही थी। जिसके कारण ऐरावत ने उस माला को उतारकर पृथ्वी पर फेंक दिया।
यह देखकर दुर्वासा बहुत क्रोधित हुए उन्होंने इसे अपमान समझा और देवराज इन्द्र को शाप दिया कि हे 'इन्द्र' ऐश्वर्य के अहंकार में आकर तुमने मेरी दी हुई इस माला का निरादर किया है। यह केवल एक माला नहीं बल्कि लक्ष्मी का धाम थी। इसलिए तुम्हारे अधिकार में जो भी तीनों लोकों की लक्ष्मी है, वह शीघ्र ही अदृश्य हो जाएगी। दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण तीनों लोक श्रीहीन हो गए और इन्द्र की राज्यलक्ष्मी समुद्र में चली गई। तब सभी देवताओं ने लक्ष्मी जी से प्रार्थना की जिससे महालक्ष्मी प्रकट हुई, तब देवराज इंद्र ने मां लक्ष्मी की स्तुति की जिसे महालक्ष्मी रक्षा स्तोत्र कहा जाता है।
महालक्ष्मी रक्षा स्तोत्र के पाठ की महिमा
जो व्यक्ति महालक्ष्मी रक्षा स्तोत्र का पाठ लीन होकर सच्ची श्रद्धा के साथ हमेशा करता है, उसे हर तरह से सुख और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि जो प्रतिदिन एक समय इसका पाठ करता है, उसके सभी पापकर्म नष्ट होते हैं और जो मनुष्य दो समय इसका पाठ करता है, उसे धन-धान्य की कोई कमी नहीं रहती है। जो मनुष्य तीनों समय इस स्तोत्र का पाठ करता है, मां महालक्ष्मी की कपा उस पर सदैव बनी रहती है।