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गुलाल नहीं, चिता की राख उड़ी: भीलवाड़ा की होली देख दंग रह जाएंगे आप, आधी रात श्मशान में उमड़ता है जनसैलाब

Tue, 03 Mar 2026 09:51 AM IST
भीलवाड़ा ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भीलवाड़ा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भीलवाड़ा Published by: भीलवाड़ा ब्यूरो Updated Tue, 03 Mar 2026 09:51 AM IST
सार

Holi 2026: राजस्थान के भीलवाड़ा में होलिका दहन की रात पंचमुखी मोक्षधाम में 17 वर्षों से चिता भस्म से होली खेली जाती है। बाबा भैरवनाथ की पालकी के साथ श्रद्धालु श्मशान में भस्म उड़ाकर जीवन-मृत्यु के दर्शन और नश्वरता का संदेश देते हैं।

Holi is played with pyres at midnight in the cremation grounds In Bhilwara news in Hindi
भस्म होली - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

    जहां देशभर में धुलंडी पर रंग और गुलाल उड़ते हैं, वहीं राजस्थान के भीलवाड़ा में होली की एक अनोखी और दार्शनिक परंपरा निभाई जाती है। यहां रंगों से नहीं, बल्कि चिता की भस्म से होली खेली जाती है वह भी आधी रात को श्मशान में। पिछले 17 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा अब शहर की विशिष्ट पहचान बन चुकी है।

    यह आयोजन शहर के पंचमुखी मोक्षधाम स्थित प्राचीन मसानिया भैरवनाथ बाबा मंदिर में होता है। मान्यता है कि इसकी शुरुआत काशी के मणिकर्णिका घाट की तर्ज पर की गई थी, जहां जीवन और मृत्यु का दर्शन एक साथ होता है।

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    होलिका दहन की रात लगभग सवा 11 बजे बाबा भैरवनाथ की पालकी मंदिर से निकलती है। ढोल-नगाड़ों, शंखनाद और जयकारों के बीच शोभायात्रा पंचमुखी मोक्षधाम के श्मशान क्षेत्र की ओर बढ़ती है। करीब सवा 12 बजे पालकी चिता स्थल पर पहुंचती है, जहां कंडों की विशेष होली जलाई जाती है।

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    इसके बाद परिजनों की अनुमति से एकत्र की गई चिता की भस्म को गुलाल की तरह हवा में उड़ाया जाता है और श्रद्धालु बाबा भैरवनाथ के साथ भस्म की होली खेलते हैं। श्मशान की नीरवता के बीच जब “बोलो बाबा भैरवनाथ की जय” के जयकारे गूंजते हैं, तो वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठता है। मंदिर के पुजारी रवि कुमार के अनुसार, “यह परंपरा भय उत्पन्न करने के लिए नहीं, बल्कि मृत्यु के भय को समाप्त करने के लिए है। राख हमें याद दिलाती है कि शरीर नश्वर है और आत्मा अमर। इसलिए यहां की होली केवल उत्सव नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है।


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    श्रद्धालुओं का विश्वास है कि भस्म की होली खेलने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है, नकारात्मक शक्तियां समाप्त होती हैं और मानसिक बल मिलता है। यही कारण है कि इस अनूठे आयोजन में शामिल होने के लिए लोग पूरे वर्ष प्रतीक्षा करते हैं। इस आयोजन में केवल भीलवाड़ा ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों और अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। महिलाएं, बच्चे और युवा सभी श्रद्धा भाव से इसमें भाग लेते हैं।

    धार्मिक मान्यता के अनुसार, काशी के मणिकर्णिका घाट के बाद देश में भीलवाड़ा ऐसा दूसरा स्थान माना जाता है, जहां चिता भस्म से होली खेली जाती है। यही वजह है कि यह आयोजन अब धार्मिक पर्यटन का केंद्र भी बनता जा रहा है।

    जहां ब्रज की लट्ठमार होली और राजस्थान की कोड़ा-मार होली प्रसिद्ध हैं, वहीं भीलवाड़ा की यह श्मशान होली अपनी विशिष्ट पहचान रखती है। यहां रंगों की चकाचौंध नहीं, बल्कि जीवन के अंतिम सत्य का साक्षात्कार होता है। राख से सना शरीर और गूंजते जयकारे यह संदेश देते हैं कि होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के संतुलन का भी पर्व है।

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