जोहो कॉर्प की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय कंपनियां तेजी से एआई अपना रही हैं, लेकिन बुनियादी सुरक्षा ढांचे की कमी के कारण उन पर साइबर हमलों का भारी खतरा है। 93% कंपनियां एआई को सुरक्षा के लिए अच्छा मानती हैं, लेकिन हर तीसरी कंपनी ने अभी तक मजबूत 'जीरो ट्रस्ट फ्रेमवर्क' लागू नहीं किया है। आइए, विस्तार से पूरी रिपोर्ट को जानते हैं...
तकनीक की दुनिया में तेजी से आगे बढ़ने की होड़ में भारत की कई कंपनियां एक बहुत बड़े और गंभीर खतरे की तरफ बढ़ रही हैं। आज के समय में हर छोटी-बड़ी कंपनी अपने काम को आसान, तेज और आधुनिक बनाने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का जमकर सहारा ले रही है। लेकिन, इस अंधी दौड़ में वे अपनी सबसे अहम चीज यानी बुनियादी सुरक्षा को पूरी तरह से भूलती जा रही हैं। कंपनियों के पास साइबर हमलों से बचने के लिए जो एक मजबूत और ठोस बुनियादी सुरक्षा ढांचा होना चाहिए, उसकी भारी कमी साफ नजर आ रही है। इसी लापरवाही के कारण कंपनियों पर बड़े साइबर हमलों का भारी खतरा मंडरा रहा है। यह चौंकाने वाला खुलासा जाने-माने सॉफ्टवेयर संगठन जोहो कॉर्प की एक ताजा रिपोर्ट में हुआ है।
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जोहो कॉर्प द्वारा जारी की गई 'स्टेट ऑफ वर्कफोर्स पासवर्ड सिक्योरिटी रिपोर्ट-2026' में कंपनियों की साइबर सुरक्षा तैयारियों को लेकर कई बड़े दावे किए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के 93 प्रतिशत संगठन यह तो मानते हैं कि एआई का इस्तेमाल उनकी साइबर सुरक्षा को और भी ज्यादा मजबूत बनाएगा, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। सच्चाई यह है कि देश की हर तीन में से एक कंपनी अब तक 'जीरो ट्रस्ट फ्रेमवर्क' यानी आधुनिक साइबर सुरक्षा का ढांचा ही अपने यहां लागू नहीं कर पाई है। जीरो ट्रस्ट फ्रेमवर्क का सीधा सा मतलब है किसी पर भी आसानी से भरोसा न करना और हर स्तर पर सुरक्षा की कड़ी जांच करना। इस अहम ढांचे के लागू न होने की वजह से ही शातिर साइबर ठगों के लिए इन कंपनियों के जरूरी डेटा में सेंध लगाना बहुत आसान होता जा रहा है।
भारतीय कंपनियां साइबर हमलों से बचने के लिए क्या कर रहीं?
टिगॉन एडवायजरी कॉर्प की तरफ से जोहो वॉल्ट के लिए दुनिया भर में किए गए इस विस्तृत वैश्विक सर्वे में एक बहुत बड़ा अंतर सामने आया है। यह अंतर भारतीय कंपनियों के सुरक्षा को लेकर उनके अति-आत्मविश्वास और उनकी असली तैयारियों के बीच का है। रिपोर्ट के अनुसार, 98 प्रतिशत भारतीय कंपनियां एआई पर आधारित नए सुरक्षा टूल्स को अपनाने की जोरदार योजना बना रही हैं। इसमें से 76 प्रतिशत कंपनियों का सबसे पहला ध्यान 'रियल-टाइम थ्रेट डिटेक्शन और रिस्पॉन्स' पर लगा हुआ है। इसका मतलब यह है कि वे ऐसी आधुनिक तकनीक चाहती हैं जो किसी भी साइबर खतरे को तुरंत पहचान ले और उसी वक्त उसका करारा जवाब भी दे सके।
कंपनियों के लिए तकनीक पहले, सुरक्षा बाद में
सुरक्षा उपायों को बेहतर बनाने की इस तेज दौड़ में 56 प्रतिशत कंपनियों का ध्यान 'यूजर बिहेवियर एनालिटिक्स' पर है, यानी वे यह गहराई से समझना चाहती हैं कि सिस्टम का इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति किस तरह का व्यवहार कर रहा है। वहीं, 55 प्रतिशत कंपनियां जोखिम पर आधारित 'एक्सेस कंट्रोल ऑटोमेशन' पर फोकस कर रही हैं, जिससे उनकी पूरी सुरक्षा व्यवस्था अपने आप बिना किसी इंसानी मदद के काम कर सके। लेकिन, इस पूरी अत्याधुनिक योजना में सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि इन तकनीकों को अपनाने की चाहत तो बहुत है, लेकिन कंपनियों की जो सबसे बुनियादी सुरक्षा स्थिति है, वह अभी भी बहुत कमजोर बनी हुई है। बिना मजबूत नींव के ये तकनीकें बेअसर हैं।
कंपनियां पहले ही हो चुकी साइबर हमलों का शिकार?
इस रिपोर्ट में एक और बहुत ही डराने वाला और कड़वा सच सामने आया है। सर्वे में यह स्पष्ट पता चला है कि लगभग 47 प्रतिशत कंपनियां पहले ही किसी न किसी तरह के गंभीर साइबर हमलों का शिकार हो चुकी हैं। सबसे ज्यादा हैरानी की बात यह है कि इन कंपनियों को सबसे बड़ा खतरा किसी बाहरी हैकर या दुश्मन से नहीं, बल्कि 'इनसाइडर थ्रेट' यानी अपने ही अंदरूनी लोगों से है। 23 प्रतिशत कंपनियों ने खुलकर माना है कि उन्हें अपने ही कर्मचारियों या सिस्टम से जुड़े लोगों से प्रमुख जोखिम बना हुआ है। इसके अलावा, 18 प्रतिशत खतरा रैनसमवेयर (डेटा चुराकर फिरौती मांगना) और 18 प्रतिशत खतरा इंसानी गलतियों (मानवीय त्रुटियों) से है।