उम्र बढ़ने को लेकर चिंता, खासकर भविष्य में स्वास्थ्य बिगड़ने का डर, सिर्फ मानसिक तनाव नहीं बल्कि शरीर की जैविक घड़ी को भी तेज कर सकता है। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी (एनवाईयू) के एक नए अध्ययन में पाया गया है कि जो महिलाएं बढ़ती उम्र को लेकर अधिक चिंतित रहती हैं, उनके खून में तेज जैविक उम्र बढ़ने के संकेत दिखाई देते हैं। यह निष्कर्ष 700 से अधिक महिलाओं पर किए गए शोध के आधार पर सामने आया है।
एनवाईयू स्कूल ऑफ ग्लोबल पब्लिक हेल्थ के इस अध्ययन में 726 महिलाओं के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया, जो मिडलाइफ इन द यूनाइटेड स्टेट्स (एमआईडीयूएस) अध्ययन का हिस्सा थीं। प्रतिभागियों से पूछा गया कि वे उम्र बढ़ने के साथ कम आकर्षक होने, स्वास्थ्य समस्याएं विकसित होने या बच्चों को जन्म देने की उम्र पार कर जाने को लेकर कितनी चिंतित हैं।
शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों के रक्त नमूनों का विश्लेषण दो स्थापित एपिजेनेटिक क्लॉक्स के माध्यम से किया। पहला क्लॉक डुनेडिनपेस जैविक उम्र बढ़ने की गति को मापता है, जबकि दूसरा ग्रिमएज2 समय के साथ शरीर में जमा हुए जैविक नुकसान का अनुमान लगाता है। परिणामों में पाया गया कि जो महिलाएं उम्र बढ़ने को लेकर अधिक चिंता व्यक्त करती थीं, उनमें डुनेडिनपेस क्लॉक के अनुसार तेज एपिजेनेटिक एजिंग के संकेत मिले।
क्यों अधिक प्रभावित हो सकती हैं महिलाएं
अध्ययन की मुख्य लेखिका और एनवाईयू स्कूल ऑफ ग्लोबल पब्लिक हेल्थ की मरियाना रोड्रिग्स के अनुसार, महिलाएं विशेष रूप से उम्र बढ़ने की चिंता के प्रति संवेदनशील होती हैं। सामाजिक अपेक्षाएं, युवावस्था और रूप-रंग को लेकर दबाव, तथा प्रजनन क्षमता से जुड़ी चिंताएं मध्य आयु में तनाव को बढ़ाती हैं।
उन्होंने कहा कि मध्य आयु की महिलाएं अक्सर कई भूमिकाएं निभा रही होती हैं, जैसे अपने वृद्ध माता-पिता की देखभाल करना। परिवार के बुजुर्गों को बीमार होते देख वे यह सोचकर चिंतित होती हैं कि कहीं उनके साथ भी भविष्य में ऐसा न हो।रोड्रिग्स के शब्दों में, हमारा शोध यह संकेत देता है कि व्यक्तिपरक अनुभव, उम्र बढ़ने के वस्तुनिष्ठ मापदंडों को प्रभावित कर सकते हैं। उम्र से जुड़ी चिंता केवल मनोवैज्ञानिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह शरीर पर वास्तविक प्रभाव छोड़ सकती है।
मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य का गहरा संबंध
अध्ययन में बताया गया कि मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य जीवनभर गहराई से जुड़े रहते हैं, भले ही अक्सर इन्हें अलग-अलग समझा जाता हो। अध्ययन के वरिष्ठ लेखक प्रो. एडोल्फो क्यूवास ने कहा कि यह शोध उम्र बढ़ने की चिंता को एक मापने योग्य और संशोधित किए जा सकने वाले मनोवैज्ञानिक कारक के रूप में पहचानता है, जो जैविक उम्र बढ़ने को प्रभावित करता प्रतीत होता है। हालांकि शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि यह अध्ययन एक ही समय बिंदु पर आधारित है, इसलिए इससे प्रत्यक्ष कारण-परिणाम संबंध स्थापित नहीं किया जा सकता।
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