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काम और जिंदगी के बीच संतुलन अहम: बेहिचक बड़ी नौकरियां छोड़ रही आधी आबादी, अब रचनात्मक काम में आजमा रहीं हाथ

Mon, 02 Nov 2026 10:44 AM IST
ज्योति भास्कर एजेंसी, न्यूयॉर्क/सैन फ्रांसिस्को।

सार

कामकाजी महिलाओं से जुड़े एक सर्वे में महिलाओं से जुड़ी खास बात सामने आई है। इसके मुताबिक कॉर्पोरेट की अंधी दौड़ से थक चुकीं मिलेनियल महिलाएं अब काम और जिंदगी के बीच संतुलन को प्राथमिकता दे रही हैं। बेहिचक बड़ी नौकरियां छोड़कर ऐसी महिलाएं रचनात्मक काम में अपने हाथ आजमा रहीं हैं। पढ़िए ये रिपोर्ट
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नौकरी छोड़ अब क्रिएटिव कार्यों में हाथ आजमा रहीं महिलाएं (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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करीब 20 साल तक कॉर्पोरेट लीडरशिप की जिम्मेदारी संभालने और मातृत्व की दोहरी भूमिका निभाने के बाद 47 वर्षीया तृषा दाब ने जब एक साल का ब्रेक लिया, तो उन्हें अहसास हुआ कि वे कितनी थक चुकी थीं। तृषा कहती हैं, जिंदगी ऐसी महसूस होती थी मानो मैं लगातार कोई मैराथन दौड़ रही हूं।

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ब्रेक के दौरान मुझे समझ आया कि मेरी प्राथमिकताएं पूरी तरह बदल चुकी हैं। अब वे कॉर्पोरेट की ऊंची कुर्सी छोड़कर ट्रैवल राइटर और सब्स्टिट्यूट टीचर के रूप में अधिक संतुलित जीवन जी रही हैं। यह केवल तृषा की कहानी नहीं है। 30 और 40 के दशक की उम्र वाली मिलेनियल महिलाएं अब कॉर्पोरेट सीढ़ी के शीर्ष पर पहुंचने की अंधी दौड़ को अलविदा कह रही हैं। 2010 के दशक में मेटा (मेटावर्स) की पूर्व सीओओ शेरिल सैंडबर्ग ने अपनी प्रसिद्ध किताब के जरिये महिलाओं को कॉर्पोरेट लीडरशिप में आगे बढ़ने के लिए 'लीन इन' का मंत्र दिया था। लेकिन आज वही मिलेनियल महिलाएं उस मंत्र को उलटकर 'लीन आउट' कर रही हैं, यानी कॉर्पोरेट दुनिया को छोड़कर अपना खुद का बिजनेस शुरू कर रही हैं, कंटेंट क्रिएटर बन रही हैं या वर्क-लाइफ बैलेंस को प्राथमिकता दे रही हैं।

कार्यस्थलों पर नहीं मिलता महत्व, जिनकी वो हकदार हैं : बिजनेस इनसाइडर से बातचीत करते हुए 57 वर्षीया शेरिल सैंडबर्ग ने स्वीकार किया कि महिलाओं का कॉर्पोरेट से यह पलायन इस बात का संकेत है कि कार्यस्थलों पर उन्हें वह महत्व और सहयोग नहीं मिल रहा जिसकी वे हकदार हैं। कहती हैं, यह महिलाएं यह नहीं कह रही हैं कि वे काम नहीं करना चाहतीं। वे कह रही हैं कि वे इसलिए काम नहीं करना चाहतीं क्योंकि उन्हें यह महसूस कराया जा रहा है कि उनकी जरूरत नहीं है, उन्हें समान अवसर और समर्थन नहीं मिल रहा, और घर पर उन पर काम का अनुचित बोझ है।

गर्लबॉस संस्कृति से सॉफ्ट लाइफ' की ओर

2010 के दशक में 'गर्लबॉस' संस्कृति का बोलबाला था, जहां गुलाबी रंग के दफ्तरों और 'आई वांट इट ऑल' जैसे नियोन अक्षरों के साथ महिलाओं को हर क्षेत्र में टॉप पर पहुंचने के लिए प्रेरित किया जाता था। लेकिन कार्यस्थल के विषाक्त माहौल और बर्नआउट की खबरों ने इस चमक-धमक की पोल खोल दी। मनोचिकित्सक एनी राइट के अनुसार, महिलाएं अब अपनी महत्वाकांक्षा को छोड़ रही हैं।

लीन इन संस्था की रिपोर्ट चौंकाने वाली

124 संगठनों के 9,500 कर्मचारियों पर किए गए हालिया सर्वेक्षण वुमेन इन द वर्कप्लेस के अनुसार पुरुषों की तुलना में महिलाएं अब पदोन्नति की इच्छा कम जता रही हैं। 28% से अधिक मिलेनियल महिलाओं ने माना कि व्यक्तिगत और पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण उनके लिए बड़ी कॉर्पोरेट भूमिकाएं निभाना मुश्किल हो रहा है, जबकि ऐसा मानने वाले मिलेनियल पुरुष केवल 17% थे। नीतियों ने उन माताओं पर दबाव बढ़ा दिया है जो बच्चों की देखभाल और बुजुर्गों की सेवा का अदृश्य बोझ उठाती हैं।

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124 संगठनों के 9,500 कर्मचारियों पर किए गए हालिया सर्वेक्षण वुमेन इन द वर्कप्लेस के अनुसार पुरुषों की तुलना में महिलाएं अब पदोन्नति की इच्छा कम जता रही हैं। 28% से अधिक मिलेनियल महिलाओं ने माना कि व्यक्तिगत और पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण उनके लिए बड़ी कॉर्पोरेट भूमिकाएं निभाना मुश्किल हो रहा है, जबकि ऐसा मानने वाले मिलेनियल पुरुष केवल 17% थे। नीतियों ने उन माताओं पर दबाव बढ़ा दिया है जो बच्चों की देखभाल और बुजुर्गों की सेवा का अदृश्य बोझ उठाती हैं।

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