मनी लॉन्ड्रिंग या टेरर फंडिंग जैसी अनियमितताएं रोकने के लिए एफएटीएफ के 27 नियम हैं, जिनका पालन हर सदस्य देश को करना होता है। इनमें से किसी भी नियम का उल्लंघन करने वाले देश को ग्रे लिस्ट में रखा जाता है। यह एक तरह से ये चेतावनी सूची है।
कोई देश ग्रे लिस्ट से कैसे निकल सकता है?
इस लिस्ट से बाहर निकलने के लिए 36 सदस्यों देशों में से 15 का समर्थन जरूरी है। अगर किसी देश में लगातार कोई सुधार ना दिखे तो उसे ब्लैक लिस्ट में डालने का प्रस्ताव दिया जाता है। ब्लैक लिस्ट में जाने से बचने के लिए कम से कम तीन देशों का समर्थन जरूरी है।
शर्तों का पालन न करने वाले देशों को पहले चेतावनी दी जाती है। साथ ही कुछ देशों की एक समिति बनाकर निगरानी की जाती है। यदि देश फिर भी स्थिति में सुधार नहीं करता है तो उसे ब्लैक लिस्ट में डालने का प्रस्ताव लाया जाता है।
पाकिस्तान ग्रे लिस्ट में क्यों है शामिल?
पाकिस्तान जून 2018 से ग्रे लिस्ट में है। इससे पहले वह 2012 से 2015 तक भी इस लिस्ट में रहा। पाकिस्तान को 27 शर्तों को पूरा करने के लिए सितंबर 2019 तक का समय मिला था। 2020 में पाकिस्तान ने 21 शर्तों का पालन तो कर लिया, लेकिन अब भी छह शर्तों का पालन नहीं कर पाया है और इसी वजह से वह ग्रे लिस्ट में बना हुआ है।
पाकिस्तान के ब्लैकलिस्ट होने का मतलब है कि ईरान की तरह पाकिस्तानी बैंकों की डीलिंग अंतरराष्ट्रीय जगत में खत्म हो जाएगी और कोई भी अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थान जैसे वर्ल्ड बैंक, आईएमएफ और एडीबी पाकिस्तान को आर्थिक मदद नहीं करेगा।
पाक के ब्लैकलिस्ट होने से पाकिस्तानी रुपये पर भारी दबाव पड़ेगा और देश की अर्थव्यवस्था काफी नीचे गिरेगी। इमरान ने कहा कि पाकिस्तान के पास विदेशी मुद्रा रिजर्व भी नहीं है जो पाकिस्तानी रुपये को बचा सके। पीएम इमरान के अनुसार अगर पाकिस्तान को ब्लैकलिस्ट किया जाता है तो महंगाई आसमान पर पहुंच जाएगी।
ब्लैक लिस्ट में आने से कैसे बचता है पाकिस्तान?
एफएटीएफ के 36 सदस्य देशों में तीन देशों का समर्थन मिल जाने से पाकिस्तान हमेशा बच जाता है। ये तीन देश चीन, मलेशिया और तुर्की हैं। चीन शुरुआत से पाकिस्तान के समर्थन में रहा है।