लगभग पचास साल से ईरान अमेरिका के साथ जंग की आहट सुन रहा था। इसी को ध्यान में रखते हुए अपनी तैयारियां भी कर रहा था। चूंकि वह अमेरिका की सैन्य शक्ति से सीधे मुकाबला नहीं कर सकता और इस्राइल के जंग में कूदने की स्थिति में उसके लिए राह और भी मुश्किल थी, इसलिए उसकी रणनीति अलग तरह की रही। उसने ऐसे तरीकों के बारे में सोचा, जिनसे हमला करने वाले देश को नुकसान उठाना पड़े और पूरे पश्चिम एशिया के साथ-साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिलाया जा सके। आइए जानते हैं...
ईरान कितना ताकतवर?
ईरान की सेना को पश्चिम एशिया में काफी ताकतवर माना जाता है। ग्लोबल फायरपावर के अनुसार, यह विश्व की शीर्ष 20 सैन्य शक्तियों में शामिल है और 145 देशों में से 16वें स्थान पर है। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज के अनुसार, ईरानी सशस्त्र बल पश्चिम एशिया की सबसे बड़ी सेनाओं में से एक है, जिसमें कम से कम 5,80,000 सक्रिय सैनिक हैं। लगभग 2,00,000 प्रशिक्षित आरक्षित सैनिक हैं।
नेवल पोस्टग्रेजुएट स्कूल में राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों के सहायक प्रोफेसर और ईरानी सेना के विशेषज्ञ अफशोन ओस्तोवार ने द न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया, , "ईरान पर अब तक हमला न होने का एक कारण यह भी रहा कि ईरान के दुश्मन उससे भले ही डरते नहीं हों, लेकिन वे जानते थे कि उसके खिलाफ कोई भी युद्ध बेहद गंभीर होगा।"
1980 के दशक में इराक के साथ युद्ध के दौरान बहुत कम देश ईरान को हथियार बेचने के लिए तैयार थे। जब 1989 में जंग खत्म होने के एक साल बाद आयातुल्लाह खामेनेई ईरान के सर्वोच्च नेता बने। उन्होंने रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स को देश में हथियार प्रणाली बनाने का आदेश दिया। इस प्रयास में भारी संसाधन लगाए गए। वे यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि ईरान को अपनी रक्षा जरूरतों के लिए फिर कभी विदेशी शक्तियों पर निर्भर न रहना पड़े।
ईरान के पास कौन से हथियार हैं?
ईरान के पास हजारों मिसाइलें। ड्रोन भी हैं। पश्चिम एशिया के कई देशों में तैनात अमेरिकी बेस ईरान के हथियारों की जद में हैं। जून 2025 में इस्राइल के आश्चर्यजनक हमले के बाद ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोनों की कई लहरें इस्राइल पर दागीं। ईरान के हमले इस्राइल की उन्नत वायु रक्षा प्रणाली को भेद पाने में कुछ हद तक कामयाब भी रहे।
सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, पहले माना गया कि इस्राइल और अमेरिका के हमलों से ईरान के पास हथियारों का जखीरा काफी कम हो चुका है। जून 2025 के 12 दिनों के युद्ध के बाद इस्राइल का अनुमान था कि ईरान के पास केवल 1,000 से 1,500 मिसाइलें बची हैं, जो पहले 2,500 थीं। लेकिन साल के अंत तक यह आकलन किया गया कि ईरान अपना जखीरा फिर से बढ़ा रहा है और ईरान के अधिकारियों का दावा है कि काफी हद तक भरपाई हो चुकी है।
ईरान के शाहेद सुसाइड ड्रोन की बात करें तो यह यूक्रेन में रूस के युद्ध में एक विनाशकारी हथियार साबित हुआ है। इसके अलावा ईरान ने 20 से ज्यादा तरह की बैलिस्टिक मिसाइलें विकसित की हैं, जिनकी जद में दक्षिणी यूरोप तक का इलाका है।
ईरान बार-बार कहता रहा है कि उसके खिलाफ जंग केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगी। भले ही वह सैन्य रूप से अमेरिका से कमजोर हो, लेकिन ऊर्जा बाजार और वैश्विक व्यापार में खलल पैदा कर वह दुनियाभर पर असर डालने की ताकत रखता है।
ईरान ने कैसे ताकत दिखाई?
अमेरिका और इस्राइल के संयुक्त हमले के बाद ईरान ने शनिवार को पहले इस्राइल के अंदरूनी इलाकों तक मिसाइलें दागीं। इसके बाद सात और ऐसे देशों पर भी मिसाइलें दागीं, जहां अमेरिका ने अपने सैन्य ठिकाने बना रखे हैं। इनमें से कुछ देशों ने मिसाइलों को इंटरसेप्ट कर लिया, जबकि कुछ देशों में अमेरिकी सैन्य अड्डों पास मिसाइलें गिरने से धमाके सुने गए।
होर्मुज क्या है?
ईरान के पास सबसे बड़ा आर्थिक हथियार है होर्मुज जलडमरूमध्य जिसे Strait of Hormuz कहते हैं। यह दुनिया का बेहद अहम समुद्री मार्ग है, जिसके जरिए दुनिया के कुल तेल उत्पादन का लगभग पांचवां हिस्सा यानी 20% तेल और बड़ी मात्रा में एलएनजी इसी रास्ते से गुजरती है। ईरान इस जलडमरूमध्य के उत्तरी हिस्से को नियंत्रित करता है। इसे इस तरह समझें कि अगर होर्मुज बंद हो जाए तो यह वैसा ही होगा, जैसे दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की एक मुख्य नस काट दी जाए। इससे ईंधन की कीमतें आसमान छू सकती हैं। आपूर्ति शृंखलाएं बाधित हो सकती हैं। दुनियाभर में मंदी का वास्तविक खतरा पैदा हो सकता है।
हालांकि, यह कदम ईरान के लिए भी नुकसानदेह होगा क्योंकि इससे उसका अपना व्यापार और पड़ोसी अरब देशों का व्यापार भी प्रभावित होगा। इसीलिए विशेषज्ञ इसे ईरान का आखिरी हथियार मानते हैं। बता दें कि 1980 के दशक में इराक के साथ युद्ध के दौरान ईरान ने फारस की खाड़ी में समुद्री सुरंगें बिछाई थीं। माना जाता है कि इससे एक अमेरिकी युद्धपोत को 1988 में भारी नुकसान हुआ था।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
वॉशिंगटन इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ शोधकर्ता फर्जीन नदीमी ने सीएनएन को बताया, "अगर ईरान इसे अंतिम युद्ध समझे, तो वह सब कुछ झोंक सकता है। होर्मुज के रास्ते में अगर खलल पैदा होता है तो दुनियाभर में महंगाई बढ़ सकती है। यह पूरी तरह बंद हो जाए तो एक वास्तविक खतरा बन सकता है।
अमेरिका-ईरान के बीच विवाद क्या है?
बात परमाणु कार्यक्रम की है। अमेरिका और इस्राइल का आरोप है कि ईरान चुपके-चुपके परमाणु हथियार बनाने की कोशिश कर रहा है। ईरान कहता है कि यह सब शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, हम हथियार नहीं बना रहे। दुनिया में जिन देशों के पास परमाणु हथियार नहीं हैं, उनमें से ईरान अकेला है जिसने यूरेनियम को हथियार बनाने के करीब तक जाकर संवर्धित किया है। यही बात अमेरिका को खलती है।