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Ajahn Siripanyo: कौन है अजहन सिरिपान्यो? जिन्होंने भिक्षुक बनने के लिए त्याग दी पिता की अरबों की संपत्ति

Wed, 27 Nov 2024 02:39 AM IST
शुभम कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कुआला लम्पुर

सार

अजबन सिरिपान्यो जो कि मेलेशिया के जाने माने उद्योगपति आनंद कृष्णन के पुत्र है, उन्होंने अपने पिता की 40000 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति को ठुकरा कर एक अध्यात्मिक जीवन जीने का फैसला किया है। तो आईए सिरिपान्यो के शुरुआती जीवन पर प्रकाश डालते हैं। 
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वेन अजहन सिरिपान्यो - फोटो : एक्स@@Ramkshrestha
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विस्तार
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चेन्नई सुपर किंग्स के पूर्व मालिक और प्रसिद्ध परोपकारी आनंद कृष्णन के पुत्र 'वेन अजहन सिरिपान्यो', जिन्होंने मात्र 18 वर्ष की आयु में अरबों रुपए की अपनी पारिवारिक विरासत त्याग कर अध्यात्मिक जीवन अपना लिया। मलेशिया के तीसरे सबसे अमीर आदमी आनंद कृष्णन टेलीकॉम के दिग्गज रहे हैं। उनकी संपत्ति लगभग 40,000 करोड़ रुपये है। इतनी संपत्ति होने के बाद अंदाजा लगाया जा रहा था कि सिरिपान्यो अपने पिता के इतने बड़े कारोबारी साम्राज्य का उत्तराधिकारी बनेंगे, लेकिन उन्होंने अध्यात्मिक रहकर भिक्षुक बनना पसंद किया। 

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'द मॉन्क हू सोल्ड हिज फेरारी' किताब में जिक्र
वेन अजहन सिरिपान्यो के इस कदम को लेकर पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है। रॉबिन शर्मा ने अपनी किताब 'द मॉन्क हू सोल्ड हिज फेरारी' में जूलियन मेंटल नामक एक सफल वकील की कहानी बताई। जिन्होंने आध्यात्मिक मार्ग अपनाने के लिए अपनी सारी संपत्ति बेच दी, जबकि यह कहानी काल्पनिक थी, जिसके बाद थाई-मलेशियाई भिक्षु वेन अजहन सिरिपन्यो ने असल ज़िन्दगी में अरबों की संपत्ति त्याग दी। बता दें कि आनंद कृष्णन टेलीकॉम, मीडिया, तेल और गैस, रियल एस्टेट और सैटेलाइन जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में कारोबार करते हैं। 

रिट्रीट में अस्थायी रूप से ली दीक्षा
कहा जाता है कि सिरिपान्यो 18 साल की उम्र में थाईलैंड गए थे और वहां एक रिट्रीट में अस्थायी रूप से दीक्षा ली। यह अस्थायी अनुभव बाद में उनके जीवन का स्थायी हिस्सा बन गया। अब वे 20 साल से अधिक समय से थाईलैंड-म्यांमार सीमा पर स्थित एक मठ में मठाधीश के रूप में रहते हैं।
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एक नजर पालन-पोषण पर
बात अगर अजहन सिरिपन्यो के पालन पोषण की करें को, उनका पालन-पोषण लंदन में हुआ। जहां उन्होंने अपनी पढ़ाई की और आठ भाषाएं सीखीं। उनके जीवन के प्रति दृष्टिकोण में अलग-अलग संस्कृतियों का सम्मान है और इसलिए उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया। बौद्ध धर्म अपनाने के बाद भिक्षु अपनी ज़रूरतों के लिए दूसरों की मदद पर निर्भर रहते हैं लेकिन बौद्ध धर्म के नियमों के तहत वे कभी-कभी अपने परिवार से मिलते हैं और अपनी पुरानी जीवनशैली को कुछ समय के लिए अपना लेते हैं।

दो दशक पहले ही त्याग दी थी सारी दौलत
सिरिपान्यो को जो दौलत विरासत में मिलने वाली थी, उसे उन्होंने दो दशकों से भी पहले त्याग दिया था, जिसके बाद उन्होंने एक भिक्षु के रूप में उन्होंने जंगल में रहना शुरू कर दिया। आज वह थाईलैंड के दताओ डम मठ के मठाधीश हैं। कहा जाता है कि वे अपनी मां की ओर से थाई शाही परिवार से संबंध रखते हैं।

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