लेकिन सवाल ये है कि आखिर कोई शख्स ऐसी विपरीत परिस्थितियों में पढ़ाई कैसे कर सकता है? महमूद कहते हैं कि वाकई इन सारी चीजों का मनोवैज्ञानिक असर होता है क्योंकि ये सब हमारे चारों ओर हो रहा होता है। वो कहते हैं, ''जब बम बरसते हैं तो हम सिर्फ जिंदा रहने के बारे में सोचते हैं।'' ''फिर जैसे ही बमों की बरसात थोड़ी थमती है, भले ही वो कुछ देर के लिए क्यों न हो हम भविष्य के बारे में सोचने लग जाते हैं। हमारा दिमाग दो ओर भागता है। पहला तो ये सोचता है कि हम जिंदा रहेंगे भी या नहीं और दूसरा ये कि हमारे भविष्य का क्या होगा।'' "लेकिन अगर हम इस जगह पर भी किसी तरह पढ़ाई कर पा रहे हैं तो इससे उम्मीद तो जगती है ही।"
पर ये इतना आसान भी नहीं
लेकिन अगर आपको ये लगता है कि ये बहुत आसान है तो ऐसा नहीं है। कभी बिजली की दिक्कत तो कभी कुछ। हमें ज्यादातर समय जनरेटर के भरोसे ही रहना पड़ता है। इसके अलावा इंटरनेट भी एक बड़ी चुनौती है। माजेद भी कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई करते हैं। एक हवाई हमले में उनका घर तबाह हो गया। उन्हें भी इन्हीं समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है। वो कहते हैं, "परीक्षा के दौरान जब बहुत से छात्र पढ़ाई करने में व्यस्त होते हैं, हमें हमलों की चिंता रहती है।" माजेद सीरिया की आने वाली पीढ़ी को लेकर डरे हुए हैं। जहां बाकी बच्चे परीक्षाओं की चिंता करते हैं वहीं यहां के लोग पीड़ितों और हमलों का आंकड़ा जोड़ते हैं।
इसके बावजूद माजेद को पूरी उम्मीद है कि वो एक न एक दिन अपनी पीएचडी पूरी कर ही लेंगे। ''हमारी जिंदगी चलती रहेगी, ये
युद्ध हमें रोक नहीं सकते। एक दिन हम सभी मिलकर इस देश को दोबारा खड़ा करने में कामयाब हो जाएंगे।'' "मुझे पूरा यकीन है कि शिक्षा के माध्यम से हम एक बेहतर भविष्य ला पाएंगे।"