भारत पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का पारस्परिक टैरिफ अमेरिका की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के लिए बड़ा संकट खड़ा कर सकता है। अमेरिकी दवा बाजार को टैरिफ के चलते दवाओं की कमी का सामना करना पड़ सकता है। इसे लेकर विशेषज्ञों ने चिंता जताई है। आइए जानते हैं कि भारत का अमेरिकी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में क्या योगदान है और टैरिफ से क्या नुकसान हो सकता है?
भारत पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का पारस्परिक टैरिफ अमेरिका की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के लिए बड़ा संकट खड़ा कर सकता है। अमेरिकी दवा बाजार को टैरिफ के चलते दवाओं की कमी का सामना करना पड़ सकता है। इससे अमेरिकियों के लिए किफायती स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच पाना और भी मुश्किल हो जाएगा। इसे लेकर विशेषज्ञों ने चिंता जताई है। आइए जानते हैं कि भारत का अमेरिकी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में क्या योगदान है और टैरिफ से क्या नुकसान हो सकता है?
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पारस्परिक टैरिफ लगाने का एलान किया। इस सूची में भारत का नाम भी शामिल है। हालांकि टैरिफ का मुद्दा सामने आने के बाद भारत के केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल अमेरिका गए और टैरिफ के प्रभाव को कम करने का प्रयास किया। वहीं विशेषज्ञ टैरिफ लगने के बाद अमेरिकी दवा और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर चिंतित हैं।
आधी जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति करता है भारत
अमेरिका में भारतीय जेनेरिक दवाओं की बहुत अधिक मांग है। हालात यह हैं कि अमेरिका में खपत होने वाली सभी जेनेरिक दवाओं में से लगभग आधी भारत से आती हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय जेनेरिक ने अकेले 2022 में 219 बिलियन अमेरिकी डॉलर की बचत की है। विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रस्तावित टैरिफ इस स्थिति को बिगाड़ सकते हैं। इससे पहले से ही चुनौतियों से जूझ रही अमेरिकी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को टैरिफ से बड़ा झटका लग सकता है। टैरिफ कुछ भारतीय जेनेरिक दवाओं को अव्यवहारिक बना सकते हैं, जिससे दवाओं की कमी हो सकती है और मौजूदा स्वास्थ्य सेवा संबंधी समस्याएं और भी बदतर हो सकती हैं। येल विवि की दवा लागत विशेषज्ञ डॉ. मेलिसा बार्बर कहती हैं कि टैरिफ से मांग-आपूर्ति असंतुलन खराब हो सकता है।
भारतीय दवा उद्योग भी चिंतित
अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव को लेकर भारतीय दवा उद्योग भी बहुत चिंतित है। सन फार्मा और सिप्ला जैसी कंपनियों ने बढ़े हुए शुल्कों के सामने अपने कारोबार की व्यवहार्यता को लेकर चिंता जाहिर की है। सन फार्मा के चेयरमैन दिलीप सांघवी कहते हैं कि भारत और अमेरिका में दवा निर्माण लागत में बड़ा अंतर है। टैरिफ के चलते हम अपनी फैक्टरी को अमेरिका में स्थानांतरित नहीं कर सकते। चीन पर अमेरिकी टैरिफ लगने के बाद ही दवाओं के लिए कच्चे माल की लागत में 20% की वृद्धि हुई है।
दवाएं होंगी महंगी
फार्मास्युटिकल क्षेत्र भारत का सबसे बड़ा औद्योगिक निर्यात है। विशेषज्ञ कहते हैं कि पारस्परिक टैरिफ जेनेरिक दवाओं और विशेष दवाओं दोनों की लागत बढ़ाएगा। यह दवाएं महंगी होगीं। कुछ विशेषज्ञों का सुझाव है कि भारत को फार्मा उत्पादों पर अपने टैरिफ को कम करना चाहिए। इसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर नगण्य प्रभाव पड़ेगा। भारत में अमेरिकी दवा निर्यात मुश्किल से आधा बिलियन डॉलर है, इसलिए इसका प्रभाव ज्यादा नहीं पड़ेगा। भारतीय फार्मास्युटिकल अलायंस (आईपीए) ने भी पारस्परिक शुल्क से बचने के लिए अमेरिकी दवा निर्यात पर शून्य शुल्क लगाने की बात कही है।
व्यापार समझौते पर टिकी निगाहें
टैरिफ को लेकर सभी की निगाहें अमेरिका और भारत के बीच संभावित व्यापार समझौते पर टिकी हैं। पूर्व सहायक अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि मार्क लिनस्कॉट का मानना है कि नए टैरिफ के कारण कुछ परेशानी हो सकती है, लेकिन मुझे लगता है कि वे इस साल के अंत तक व्यापार समझौते पर प्रगति होगी। इन वार्ताओं के अमेरिकी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली, भारतीय दवा उद्योग और दुनिया भर के लाखों लोगों की आजीविका के लिए दूरगामी परिणाम होंगे।