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खतरा बनता खालिस्तान: क्यों हुई इस अलगावादी आंदोलन की शुरुआत, कैसे आतंकियों ने कनाडा को बनाया पनाहगाह?

Thu, 21 Sep 2023 05:36 PM IST
शिवेंद्र तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

खालिस्तानी आतंकियों की पनाह का मुद्दा क्या है? इसकी शुरुआत कब हुई? कनाडाई पीएम पर इसके प्रति नरम रुख अपनाने का आरोप क्यों लगता रहा है? आइये जानते हैं...
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कनाडा - फोटो : AMAR UJALA
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विस्तार
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खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या को लेकर कनाडा और भारत आमने-सामने हैंI दरअसल, पिछले दिनों कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने निज्जर की हत्या को लेकर भारत की तरफ इशारा किया। भारत ने इन आरोपों को निराधार बताया।  भारत पर लगाए आरोपों के बाद दोनों देशों ने एक दूसरे के राजनयिकों को देश से निष्कासित करने कर दिया। 
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भारत ने कहा कि इस तरह के आरोप सिर्फ उन खालिस्तानी आतंकी और कट्टरपंथियों से ध्यान हटाने के लिए जिन्हें लंबे समय से कनाडा में शरण दी जा रही है। इससे पहले भी भारत कई बार कनाडा में बढ़ती भारत विरोधी गतिविधियों का मुद्दा उठा चुका है। लिहाजा सवाल भी उठते हैं कि कनाडा में खालिस्तानी आतंकियों की पनाह का मुद्दा क्या है? इसकी शुरुआत कब हुई? कनाडाई पीएम पर इसके प्रति नरम रुख अपनाने का आरोप क्यों लगता रहा है? आइये जानते हैं...

 

खालिस्तान क्या है?
1947 में आजादी मिलने के बाद भारत और पाकिस्तान दो देश बने। इसी के साथ पंजाब सूबे का बंटवारा हुआ जिसका बड़ा भाग पाकिस्तान के पास चला गया और कुछ हिस्सा हमारे पास बचा। बंटवारे के दौरान जान-माल का बहुत नुकसान हुआ। लाहौर, जो कभी सिख साम्राज्य की राजधानी था वो पाकिस्तान में चला गया।  
इसके बाद पंजाबी भाषी लोगों के लिए एक अलग राज्य की मांग की शुरुआत पंजाबी सूबा आंदोलन से हुई थी। यह पहला मौका था जब पंजाब को भाषा के आधार पर अलग दिखाने की कोशिश हुई थी। अकाली दल का जन्म हुआ और कुछ ही वक्त में इस पार्टी ने बेशुमार लोकप्रियता हासिल कर ली। अलग पंजाब के लिए जबरदस्त प्रदर्शन शुरू हुए और अंत में 1966 में ये मांग मान ली गई।



भाषा के आधार पर पंजाब, हरियाणा और केंद्र शाषित प्रदेश चंडीगढ़ की स्थापना हुई।
उसी दौर में 'खालिस्तान' के तौर पर स्वायत्त राज्य की मांग समेत कई मांगें उठाई गईं जिन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने खारिज कर दिया। उन्होंने कहा था कि ये कोई ऑटोनोमी की मांग नहीं है, बल्कि उसकी आड़ में अलग देश की संरचना बनाने की कोशिश है। 'खालिस्तान' की मांग ने 1970 के दशक में जोर पकड़ना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे ये मांग बढ़ने लगी और इसे खालिस्तान आंदोलन का नाम दिया गया। 
 

कनाडा तक कैसे पहुंच गई खालिस्तान की कहानी?
भारत के बाद कनाडा ऐसा देश है जहां दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सिख आबादी रहती है। 1980 के दशक में जब पंजाब में खलिस्तान अलगाववादी आंदोलन अपने चरम पर था, तब इसे वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता थी। कहा जाता है कि पाकिस्तान की आईएसआई ने मौके का फायदा उठाया और भारत से कनाडा गए अलगाववादियों के साथ मिलकर इसकी आग देश में भड़काई। इसका कारण कनाडा की कानूनी प्रणाली के कमजोर प्रत्यर्पण कानूनों को माना गया। 
कहा जाता है कि आईएसआई ने पाकिस्तान में रह रहे अलगाववादी नेताओं को कनाडा में स्थानांतरित करना शुरू कर दिया। एजेन्सी ने कनाडा में पहले से ही रह रहे अलगाववादियों को आंदोलन के लिए वित्तीय सहायता भी जुटाई।

न्यूयॉर्क टाइम्स - फोटो : SOCIAL MEDIA
न्यूयॉर्क टाइम्स में खालिस्तान के उदय का विज्ञापन 
पाकिस्तान शुरू से ही इस अलागवादी आंदोलन को खाद बीज देता रहा। 1971 में उभरे खालिस्तानी नेता जगजीत सिंह चौहान ने खुद को खालिस्तान का प्रमुख घोषित कर दिया। जगजीत एक दंत चिकित्सक था जो पंजाब छोड़कर लंदन चला गया। पाकिस्तान के सैन्य तानाशाह जनरल याह्या खान ने जगजीत का समर्थन किया। इसी बीच जगजीत न्यूयार्क पहुंचा और अक्तूबर 1971 को न्यूयॉर्क टाइम्स में खालिस्तान के उदय की घोषणा करते हुए एक विज्ञापन चलाया। 

कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के पिता पियरे ट्रूडो - फोटो : SOCIAL MEDIA
पियरे ट्रूडो का पुलिस अधिकारियों की हत्या के आरोपी के प्रत्यर्पण से इनकार 
साल 1974 आया जब भारत ने राजस्थान में पोखरण परमाणु परीक्षण किया। हालांकि, यह फैसला कई देशों को रास नहीं आया जिसमें एक देश कनाडा भी था। उस वक्त के कनाडाई प्रधानमंत्री और जस्टिन ट्रूडो के पिता पियरे ट्रूडो ने परीक्षण का विरोध किया लिहाजा दोनों देशों के रिश्ते भी बिगड़े। बात यहीं नहीं रुकी आगे 1982 में पियरे ट्रूडो ने पंजाब में दो पुलिस अधिकारियों की हत्या के आरोपी तलविंदर सिंह परमार के प्रत्यर्पण से इनकार कर दिया। इसका जिक्र कनाडाई पत्रकार टेरी मिलेवस्की ने अपनी पुस्तक 'ब्लड फॉर ब्लड' में किया है।

पंजाब में खालिस्तान की एंट्री - फोटो : अमर उजाला
भारत में चरम पर पहुंचा विद्रोह
इधर 1980-1984 के बीच पंजाब में हिंसा की घटनाओं में भारी उछाल आया। 1983 में पंजाब के डीआईजी अटवाल की स्वर्ण मंदिर परिसर में ही हत्या कर दी गई। इसी साल से भिंडरावाला ने स्वर्ण मंदिर को अपना ठिकाना बना लिया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लिए सिरदर्द बने इस मुद्दे के कई विकल्प शुरुआत में तलाशे गए। भिंडरवाला को स्वर्ण मंदिर से निकालने की तैयारी की जाने लगी। भारतीय सेना ने 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' को अंजाम दिया। स्वर्ण मंदिर के अंदर छह जून 1984 को व्यापक अभियान चलाया गया, भारी गोलीबारी के बाद जरनैल सिंह भिंडरवाला का शव बरामद कर लिया गया। सात जून 1984 को स्वर्ण मंदिर पर भारतीय सेना का नियंत्रण हो गया।
इस ऑपरेशन के बाद सिख समुदाय के लोग इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ जबरदस्त गुस्से में थे, कैप्टन अमरिंदर सिंह समेत कई सिख नेताओं ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। खुशवंत सिंह समेत कई लेखकों ने अपने अवॉर्ड वापस कर दिए थे। महज चार महीने बाद ही 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके ही दो सुरक्षाकर्मियों ने कर दी थी। तलविंदर सिंह परमार इस घटनाक्रम के पीछे का मास्टरमाइंड बताया गया। 1990 के दशक में खालिस्तान आंदोलन भारत में बड़े रूप में खत्म हो गया लेकिन कनाडा में यह जीवित रहा।  

खालिस्तानी आतंकी हरदीप निज्जर - फोटो : twitter
अब क्या हुआ है?
दरअसल, खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की 18 जून 2023 को कनाडा में गोली मारकर हत्या कर दी गई। उसे कनाडा में ब्रिटिश कोलंबिया के सरी स्थित गुरुनानक सिख गुरुद्वारा के पास दो अज्ञात बंदूकधारियों ने गोली मार दी। निज्जर इस गुरुद्वारे का संचालन करने वाली कमेटी का प्रधान भी था। 
निज्जर की हत्या को लेकर कनाडाई पीएम जस्टिन ट्रूडो ने भारत की ओर इशारा किए। ट्रूडो ने आरोप लगाए कि कनाडाई सुरक्षा एजेंसियों के पास यह मानने के कारण है कि भारत सरकार के एजेंटों ने ही निज्जर की हत्या की। कनाडाई एजेंसियां निज्जर की हत्या में भारत की साजिश की संभावनाओं की जांच कर रही हैं। ट्रूडो कहा कि कनाडा की धरती में कनाडाई नागरिक की हत्या में किसी भी प्रकार की संलिप्तता अस्वीकार्य है। 
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भारत-कनाडा में तनाव गहरा रहा है। - फोटो : अमर उजाला
भारत का कनाडा को करारा जवाब
आरोपों पर भारत के विदेश मंत्रालय ने करारा जवाब दिया। मंत्रालय ने कनाडा के आरोपों को बेतुका और पूर्वाग्रह से ग्रसित करार दिया। भारत ने कहा कि इस तरह के आरोप सिर्फ उन खालिस्तानी आतंकी और कट्टरपंथियों से ध्यान हटाने के लिए है जिन्हें लंबे समय से कनाडा में शरण दी जा रही है और जो भारत की क्षेत्रीय एकता और अखंडता के लिए लगातार खतरा बने हुए हैं।

इसी बीच, कनाडा की ओर से एक वरिष्ठ भारतीय राजनयिक को निकाल दिया गया। कनाडा सरकार का आरोप है कि भारतीय राजनयिक हत्याकांड की जांच में हस्तक्षेप कर रहे थे। विदेश मंत्रालय ने कनाडा की ओर से राजनयिक को निकाले जाने के फैसले का विरोध करते हुए मंगलवार को कनाडा के उच्चायुक्त को तलब किया। साथ ही उन्हें कनाडा के एक वरिष्ठ उच्चायुक्त को निष्कासित किए जाने की जानकारी दी। इस राजनयिक को पांच दिन के अंदर भारत छोड़ने का निर्देश दिया गया। 
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