भारत में आज की सुबह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर थोड़ी सुकूंन वाली है। ईरान और इस्राइल के आग्नेयास्त्र पिछले 24 घंटे में कम गरजे हैं। अमेरिका नई तैयारी में है। पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष से लंच के बाद राष्ट्रपति ट्रंप रूमाल से हाथ पोछ रहे हैं। जबकि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने इस जंग को लेकर अपना संदेश देना शुरू कर दिया है। हालांकि, ईरान ने इस्राइल से अस्पताल पर हमला किया है।इस्राइली सेना ने ईरान के अराक परमाणु रिएक्टर को निशाना बनाया है। जानिए अब इसके आगे क्या?
इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और राष्ट्रपति ट्रंप दो दिन पहले ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को सीधे टारगेट पर लेने का संदेश दे रहे थे। सीधे बिना शर्त सर्मपण की बात। खामेनेई ने इसे बड़े सख्त लहजे में ठुकरा दिया। ईरान के समर्पण न करने और अमेरिका को भी सबक सिखाने का संदेश दे दिया। सामरिक और रणनीतिक मामलों के जानकार इस संदेश को बड़ी गंभीरता से ले रहे थे। चीन इसको लेकर लगातार अपनी प्रतिक्रिया दे रहा था। जबकि रूस खामोश था। अब राष्ट्रपति पुतिन ने चुप्पी तोड़ी है। राष्ट्रपति पुतिन लगातार अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप, इस्राइल, ईरान के संपर्क में थे। सऊदी अरब समेत अन्य देशों के हुक्मरान से उनकी बात चल रही थी। माना जा रहा है कि जल्द मध्य एशिया में कुछ बड़ा होने जा रहा है।
रूस और चीन की चिंता क्या है?
पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं कि चीन का लक्ष्य दुनिया में नं. 2 पर आने की है। यह तभी संभव है, जब रूस थोड़ा नीचे खिसकेगा। लेकिन विदेश मामले के जानकार एसके शर्मा कहते हैं कि चीन में सैन्य आपरेशन, दखल देने,दूसरे देश के मामले स्टैंड लेने की हिम्मत अभी दुनिया ने नहीं देखी है। जबकि रूस और खासकर पुतिन के कार्यकाल में ऐसा हमेशा करता रहा है। रूस मध्य-पूर्व एशिया में संतुलन बनाए रखता आया है। 2015-16 में सीरिया में बशर अल असद की सरकार को बनाए रखने के लिए रूस ने सैन्य आपरेशन तक चलाया था। खामेनेई हमेशा इस्राइल को अमेरिका के प्रॉक्सी के रूप में मध्य एशिया के लिए बड़ा खतरा देखते हैं। माना जाता है कि ऐसे में मध्य-पूर्व एशिया में इस्राइल के बहाने सीरिया के बाद ईरान में अमेरिका के दखल बढ़ाने की कोशिश पुतिन को हजम होना मुश्किल है। चीन ने भी इस्राइल की मनमाना सैन्य कार्रवाई का विरोध किया। रूस हमेशा से इसके खिलाफ रहा। हालांकि रूस और चीन दोनों के इस्राइल और ईरान से अच्छे संबंध हैं। पूर्व विदेश सचिव शशांक भी मानते हैं कि राष्ट्रपति पुतिन ने राष्ट्रपति ट्रंप को समझाया होगा कि ईरान में सत्ता में बदलाव के बाद यह जरूरी नहीं है कि पश्चिम के मंसूबे वाली सरकार आ जाएगी। वहां अफगानिस्तान और सीरिया की तरह इस्लामिक रेडिकल इलेमेंट सत्ता पर काबिज हो सकते हैं। इसलिए अयातुल्ला खामेनेई के पीछे पड़ने का कोई अर्थ नहीं है। लेकिन यहां इन सबके साथ-साथ मुख्य सवाल अमेरिका दबदबे और दुनिया के संसाधनों पर राज की मंशा का है।
....लेकिन अमेरिका कर रहा है तैयारी
राष्ट्रपति ट्रंप जो कहते हैं, वह नहीं करते। तमाम कदम ऐसा उठाते हैं, जिसका जिक्र तक नहीं करते। उनकी निगाहें कहीं और निशाना कहीं और होता है। माना जा रहा है कि अमेरिका अपनी तैयारी कर रहा है। उसका ताकतवर बेड़ा यूएसएस निमित्ज ईरान के खतरे को देखकर निकल चुका है। दोदो बेड़े, लड़ाकू विमान, ड्रोन, वायुरक्षा प्रणाली आदि पहले से क्षेत्र में तैनात हैं। युद्धपोत, विध्वंसक, डिस्ट्रायर सब अपनी पोजिशन लिए हैं। पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल मुनीर के साथ लंच और अमेरिका के प्रेम को इसी नजरिए से देखा जा रहा है। पाकिस्तान से ईरान सटा है। ईरान में कोई आपरेशन चलाना है तो उसके लिए पाकिस्तान के एयरफील्ड समेत अन्य की जरूरत पड़ सकती है। इसके अलावा अफगानिस्तान और क्षेत्र में अमेरिका अपनी धमक बनाए रखने की नीति पर काम कर रहा है।
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राष्ट्रपति ट्रंप को समझना होगा। अभी अब भी वह आपरेशन सिन्दूर में भारत-पाकिस्तान के बीच लड़ाई रुकवाने का बयान देना बंद नहीं कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से 35 मिनट की पोन पर बात के बाद भी यह नहीं कहा जा सकता कि कब वह इस बयान को फिर अच्छे तरीके दोहरा दें।ट्रंप के पिछले चार साल के कार्यकाल में अमेरिका ने कोई युद्ध नहीं लड़ा था। अभी वह दुनिया के देशों को ट्रेड वार और टैक्स की नुमाइश दिखा रहे हैं। जी-7 की बैठक में उन्होंने रूस के साथ प्रतिद्वंदिता की बजाय मिलकर काम करने की इच्छा शक्ति दोहराई। यूक्रेन के मामले में पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन की तरह रूस को नहीं छेड़ रहे हैं। यूक्रेन को छोड़ भी नहीं रहे हैं। ट्रंप प्रधानमंत्री को शानदार व्यक्ति बताते हैं। भारत को महत्वपूर्ण और पाकिस्तान से प्यार करने का संदेश देता है।
आगे क्या है संभावना, क्या निकलेगी शांति की राह....
रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि उन्होंने इस्राइल, ईरान, सऊदी अरब, अमेरिका के राष्ट्रपति से लगातार इस मुद्दे पर बात की है। वह क्षेत्र में युद्ध नहीं शांति चाहते हैं। राष्ट्रपति पुतिन ने कहा है कि उन्होंने सभी को एक प्रस्ताव दिया है। साफ संकेत हैं कि वह चुप नहीं बैठे हैं। ईरान का भरोसा रूस पर है। उसके सर्वोच्च नेता खामेनेई यह भरोसा चीन उतना भरोसा नहीं करते। अमेरिका पर बिल्कुल नहीं। रूस ने टकराव रोकने के लिए बीच का कोई रास्ता निकाला है। रूस की मंशा ईरान में खामेनेई की सत्ता को बनाए रखने की है। प्रस्ताव का मुख्य बिन्दु ईरान का परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किए बिना परमाणु हथियार न विकसित करने का भरोसा देने से जुड़ा हो सकता है। रूस का हमेशा से मानना है कि अस्तित्व के लिए आत्मरक्षा का अधिकार ईरान और इस्राइल दोनों को है। ऐसे में मध्यस्थता और युद्ध के रुकने की गुंजाइश बन रही है। राष्ट्रपति पुतिन ने खुद संदेश दिया है कि अंतत: इस पर इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई को राजी होना है। यदि इस्राइल और ईरान इस पर राजी हो जाते हैं तो शांति मुमकिन है।
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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी खोल सकते हैं विंडो
रूस के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को रूस के कदम उठाने का इंतजार था। माना जा रहा है कि पुतिन के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चुप्पी तोड़ने अब चीन भी मध्य-पूर्व में शांति के प्रयास पर खुलकर जोर दे सकता है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इस मामले में हमेशा रुख साफ है। वह भारत को बुद्ध का देश बताते हैं। जहां से शांति और अहिंसा का संदेश निकलता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहे रूस-यूक्रेन का टकराव हो या इस्राइल-ईरान की जंग, हमेशा कहते रहे हैं कि संवाद से समस्या का समाधान निकाला जाना चाहिए। यह युग युद्ध का नहीं है। पाकिस्तान के साथ तनाव में भी उन्होंने इसका संदेश दिया। आपरेशन सिन्दूर के दौरान पाकिस्तान से प्रायोजित आतंकवाद का विरोध किया। सीमित, सटीक तरीके से ातंकी शिविर नष्ट किए, लेकिन युद्ध को न भड़कने देने की वकालत करता रहा। युद्ध विराम के समझौते को मानने में भारत ने कोई हठधर्मिता नहीं दिखाई।
ईरान परमाणु अप्रसार संधि (NPT) से बाहर आने की धमकी दे रहा है। वह इस पर हस्ताक्षर कर चुका है। अमेरिका चाहता है कि ईरान भरोसा दे कि वह परमाणु अप्रसार संधि का सख्ती से पालन करेगा। यूरेनियम का संवर्धन निर्धारित सीमा से अधिक नहीं करेगा और परमाणु हथियार उत्पादन से दूर रहेगा। माना जा रहा है कि ईरान के इस भरोसे और आईआईए की निगरानी में आने के बाद शांति स्थापना की रह खुल सकती है।