क्या पश्चिम एशिया में छिड़ी जंग अब नहीं थमेगी? यह सवाल अब पूरी दुनिया में गूंज रहा है। शांति की उम्मीदों को उस वक्त बड़ा झटका लगा, जब अमेरिका की तरफ से एक बड़ा कूटनीतिक फैसला लिया गया। ट्रंप ने ईरान के साथ शांति वार्ता के लिए पाकिस्तान जाने वाले अपने खास दूतों का दौरा अचानक रद्द कर दिया है। इस फैसले ने साफ कर दिया है कि ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत का रास्ता फिलहाल बंद हो गया है। अमेरिका के इस सख्त कदम से दोनों देशों के बीच फिर से तनाव बढ़ने की आशंका पैदा हो गई है।
उन्होंने आगे बताया है कि उनके प्रतिनिधि जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ शांति वार्ता के लिए पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद नहीं जाएंगे। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में लिखा कि उन्होंने ईरानियों से मिलने के लिए अपने प्रतिनिधियों का दौरा रद्द कर दिया है। उनका मानना है कि इस यात्रा और यात्रा की तैयारियों में बहुत ज्यादा समय बर्बाद हो रहा था। उन्होंने फॉक्स न्यूज को भी इस रद्दीकरण के बारे में बताया है। इस बीच, खबर है कि ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची भी पाकिस्तानी अधिकारियों से मुलाकात के बाद शनिवार शाम इस्लामाबाद से वापस लौट गए हैं।
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ट्रंप ने क्यों रद्द किया पाकिस्तान का दौरा?
ट्रंप ने इस अहम दौरे को रद्द करने के पीछे ईरान की अंदरूनी राजनीति को सबसे बड़ी वजह बताया है। उनका कहना है कि ईरान के नेतृत्व में बहुत ज्यादा आपसी लड़ाई और भारी भ्रम फैला हुआ है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि वहां किसी को नहीं पता कि सत्ता किसके हाथ में है और फैसले कौन ले रहा है, खुद ईरानियों को भी इसकी जानकारी नहीं है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अमेरिका के पास सारे पत्ते (ताकत) हैं और ईरान के पास कुछ नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर ईरान बात करना चाहता है, तो उन्हें बस अमेरिका को फोन करना होगा।
क्या अमेरिका फिर से युद्ध शुरू करेगा?
इस कूटनीतिक दौरे के रद्द होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या अमेरिका अब फिर से ईरान पर हमला करेगा। इस सवाल के जवाब में उन्होंने एक अमेरिकी समाचार आउटलेट एक्सियोस को बताया कि दूतों की यात्रा रद्द होने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि अमेरिका ईरान पर युद्ध फिर से शुरू कर देगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका ने अभी तक युद्ध शुरू करने के बारे में कुछ नहीं सोचा है। उन्होंने फॉक्स न्यूज से बातचीत में भी यही दोहराया कि ईरानी जब चाहें तब हमें कॉल कर सकते हैं। यानी अमेरिका ने बातचीत का दरवाजा पूरी तरह से बंद नहीं किया है।
अमेरिका को किस बात की थी आशंका?
इस पूरे घटनाक्रम पर अमेरिका के पूर्व सहायक विदेश मंत्री (राजनीतिक-सैन्य मामले) मार्क किमिट ने अपनी बेबाक राय रखी है। उनका कहना है कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का पाकिस्तान न जाना ईरान के अलग-अलग शक्ति केंद्रों के बीच के मतभेदों को दर्शाता है। किमिट ने कहा कि ईरान में अंतिम फैसला लेने वाला कोई एक व्यक्ति नहीं है। उन्हें आशंका है कि शायद ईरान ने जानबूझकर अमेरिकियों को शर्मिंदा करने के लिए ऐसा किया हो। ऐसा लगता है कि व्हाइट हाउस को इस्लामाबाद में बातचीत का भरोसा दिया गया था, लेकिन ईरान के विदेश मंत्री अराघची का विचार कुछ और ही था। यह भी साफ नहीं है कि अमेरिका ने ईरान की संसद या अन्य शक्ति केंद्रों से बात की थी या नहीं।
पाकिस्तान से लौटे ईरानी विदेश मंत्री
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची शनिवार शाम पाकिस्तान से वापस लौट गए। अराघची ने इस्लामाबाद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख से मुलाकात कर अपनी मांगें स्पष्ट कर दी हैं कि वे अमेरिका की अतिवादी शर्तें नहीं मानेंगे। दरअसल, इस वार्ता में कई पेच फंसे हुए हैं। ईरान बातचीत शुरू होने से पहले तेल निर्यात पाबंदियों में ढील चाहता है, जबकि अमेरिका चाहता है कि ईरान पूरी तरह से अपना परमाणु कार्यक्रम छोड़े।
'सेव अमेरिका एक्ट' पास न हुआ तो होगा ऐतिहासिक नुकसान- ट्रंप
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 'सेव अमेरिका एक्ट' पास न होने पर सीनेट में राजनीतिक दल के लिए इतिहास के सबसे बुरे परिणामों की चेतावनी दी है। इसे उन्होंने 'अनरिकवरेबल डेथ विश' करार दिया। साथ ही, ट्रंप ने तुरंत फिलिबस्टर (सीनेट में बहस के जरिए अड़ंगा डालने की प्रक्रिया) को खत्म करने की भी कड़ी मांग की है।
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