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वैक्सीन उत्पादन में किसका कितना हिस्सा और निर्यात में कौन आगे?

Fri, 16 Apr 2021 02:53 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन

सार

अमेरिका ने अपने यहां उत्पादित हो रही लगभग सभी वैक्सीन डोज को अपने घरेलू इस्तेमाल के लिए रखा हुआ है। दुनिया में अब तक वैक्सीन के हुए कुल उत्पादन में अमेरिका का हिस्सा 27 फीसदी है। लेकिन निर्यात में अब तक उसका योगदान शून्य है...
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कोरोना वैक्सीन - फोटो : Agency (File Photo)
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विस्तार
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कोरोना वायरस से लड़ाई की मुहिम में इस हफ्ते दुनिया ने एक खास मुकाम तय किया है। इस हफ्ते वैक्सीन डोज के उत्पादन में एक अरब का आंकड़ा पार हो गया है। अब उत्पादन की गति बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। विज्ञान संबंधी सूचना और विश्लेषण करने वाली संस्था एयरफिनिटी के मुताबिक वैक्सीन के पहले एक अरब डोज का उत्पादन करने में कई महीने लगे। लेकिन अगले एक अरब डोज मई के आखिर तक तैयार हो जाएंगे।

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इस संस्था के मुताबिक अब तक चीन कोविड-19 वैक्सीन के सबसे बड़े उत्पादक देश के रूप में सामने आया है। वह सबसे बड़ा निर्यातक भी बना हुआ है। भारत दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश है, लेकिन वहां आई कोरोना महामारी की दूसरी घातक लहर के कारण भारत ने निर्यात को फिलहाल सीमित कर दिया है। रूस, स्विट्जरलैंड, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका में भी वैक्सीन खुराकों का उत्पादन हो रहा है। लेकिन वहां से निर्यात की मात्रा कम है।

अमेरिका ने अपने यहां उत्पादित हो रही लगभग सभी वैक्सीन डोज को अपने घरेलू इस्तेमाल के लिए रखा हुआ है। दुनिया में अब तक वैक्सीन के हुए कुल उत्पादन में अमेरिका का हिस्सा 27 फीसदी है। लेकिन निर्यात में अब तक उसका योगदान शून्य है। जानकारों का कहना है कि जब देश के अंदर सबका टीकाकरण हो जाएगा, तब मुमकिन है कि अमेरिका सबसे बड़ा निर्यातक बन जाए। आंकड़ों की वेबसाइट ऑवर वर्ल्ड इन डेटा के मुताबिक गुरुवार तक दुनिया में जितना टीकाकरण हुआ था, उसका 23 फीसदी हिस्सा अमेरिका में हुआ। जो बाइडन प्रशासन ने सत्ता में आने के बाद टीकाकरण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। इस कारण वहां ये काम तेज गति से आगे बढ़ रहा है।
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ऑवर वर्ल्ड इन डेटा के मुताबिक दुनिया में हुए टीकाकरण में चीन का हिस्सा 21 फीसदी, भारत का 14 फीसदी, ब्रिटेन का पांच फीसदी और ब्राजील का 4 फीसदी है। पूरे अफ्रीका महाद्वीप का हिस्सा कुल वैश्विक टीकाकरण में सिर्फ 1.6 फीसदी है।

जहां तक विदेश को टीका के डोज भेजने का सवाल है, चीन ने शुरुआत में ही बढ़त बना ली। उसने टीकों के करोड़ो डोज दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भेजे हैं। चीन के टीके लैटिन अमेरिका में भी लगाए जा रहे हैं। अफ्रीका और एशिया के कई देशों को उसने टीकों की सप्लाई की है।

बाइडन प्रशासन के ‘वैक्सीन राष्ट्रवाद’ की कई हलकों में कड़ी आलोचना हुई है। उसे देखते हुए बाइडेन प्रशासन ने पिछले हफ्ते ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनिका कंपनी की वैक्सीन की 40 लाख डोज मेक्सिको और कनाडा भेजने की पेशकश की। गौरतलब है कि इस वैक्सीन के अमेरिका में इस्तेमाल को मंजूरी नहीं मिली है। इसीलिए इस अमेरिकी पेशकश को संदेह की निगाहों से देखा गया है। अमेरिका ने वैक्सीन के मामले में सहयोग की पहल- कॉवैक्स को चार अरब डोज देने का वादा किया है। लेकिन इस वादे पर अमल वह तब शुरू करेगा, जब पहले सभी अमेरिकी लोगों का टीकाकरण हो जाएगा।

इस ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के बारे में अमेरिका की पेनसिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के वाइस प्रोवोस्ट जेक एमैनुएल ने वेबसाइट एक्सियोस.कॉम से कहा है कि अमेरिका में निश्चित रूप से वैक्सीन के जरूरत से ज्यादा डोज उपलब्ध हो जाएंगे। उन्होंने कहा- ‘यह कहना अनैतिक है कि पहले हम दस करोड़ डोज का भंडार बनाएंगे। यह राजनयिक और रणनीतिक भूल भी है।’ उन्होंने ध्यान दिलाया कि चीन और रूस विभिन्न देशों को वैक्सीन दे रहे हैं और उन्हें याद दिला रहे हैं कि वक्त पर उनके काम कौन आया। उन्होंने ध्यान दिलाया कि दुनिया में बने कुल डोज का 33 फीसदी चीन में उत्पादित हुआ है। चीन ने इसके 62 फीसदी हिस्से को दूसरे देशों में भेजा है। 

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