थिंक टैंक सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के वरिष्ठ उपाध्यक्ष जेम्स लुइस ने राय जताई है कि 9/11 से चीन के रणनीतिक लक्ष्य पहले भी वही थे। लेकिन इस घटना से उसे अमेरिका से अपने अंतर को घटाने का मौका मिल गया। ब्राउन यूनिवर्सिटी के कॉस्ट ऑफ वॉर प्रोजेक्ट (युद्ध की लागत परियोजना) के मुताबिक अमेरिका ने अफगानिस्तान और इराक से युद्ध में लगभग आठ ट्रिलियन डॉलर खर्च किए। लुइस के मुताबिक अमेरिका चाहता तो इस रकम का इस्तेमाल अनुसंधान और विकास, अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर को आधुनिक बनाने और हाई टेक हथियार बनाने में कर सकता था।
जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ फॉरेन सर्विस में प्रोफेसर इवान मेडियॉर्स ने एनबीसी से कहा- ‘हमने उन्हें 20 साल दे दिए। अपनी आज की प्रमुख चुनौती पर गौर करें, तो साफ होता है कि इस अवधि में हमने अपनी सेना को अप्रासंगिक युद्ध में लगाए रखा।।’ इस बीच चीन ने जहाज नष्ट करने वाली मिसाइलें बनाईं और अपनी नौसेना का विस्तार किया। उधर अमेरिकी सेना पश्चिमी एशिया में एके-47 राइफलों से लड़ती रही और अमेरिकी वायु सेना ऐसी जगह कार्रवाइयां करती रहीं, जहां उसे कोई चुनौती नहीं थी।
मेडियॉर्स न ध्यान दिलाया है कि 9/11 के हमलों के बाद तत्कालीन बुश प्रशासन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन का समर्थन पाने की कोशिश में उसके प्रति अपनी नीति बदल दी। तब से अमेरिका ताइवान और मानवाधिकार के मुद्दों पर आंख मूंदे रहा। मेडियॉर्स ने कहा- ‘चीन से कैसी आर्थिक चुनौती पेश आने वाली है, यह समझने में लोगों को वक्त लगा।’