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माइक पोम्पियो ने तोड़ी वर्जना, वेस्ट बैंक जाकर बढ़ाई बाइडेन की मुश्किलें

Fri, 20 Nov 2020 02:52 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन

सार

  • इस्रायली कब्जे वाले फिलस्तीनी इलाके में जाकर किया सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों का उल्लंघन
  • अमेरिकी विदेश मंत्रालय के अधिकारी पोम्पियो के दौरे से चिंतित, उनका निजी फैसला बताया
  • जानकार बताते हैं, पोम्पियो की नजर 2024 में राष्ट्रपति चुनाव लड़ने पर है
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Protest against Mike Pomepo - फोटो : Agency
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विस्तार
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अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने पश्चिमी किनारे में इस्रायली कब्जे वाली बस्ती में जाकर अगले अमेरिकी प्रशासन की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पोम्पियो गुरुवार को पश्चिमी किनारे की सगोट नाम की बस्ती में गए। ये फिलस्तीनी इलाका इस्रायल ने जबरन कब्जा किया था। अमेरिका ने आज तक इसे मान्यता नहीं दी थी। यानी पोम्पियो का ये दौरा अतीत के सारे अमेरिकी प्रशासनों की नीति के खिलाफ है। यह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों का उल्लंघन भी है।

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सगोट में खुद पोम्पियो ने भी ये बात कही। उन्होंने कहा- लंबे समय से अमेरिका के विदेश मंत्रालय ने इस विशेष स्थान के इतिहास को मान्यता नहीं दी थी। आज अमेरिकी विदेश मंत्रालय मजबूती से यह मान्यता दे रहा है कि ये बस्तियां कानूनी और उचित ढंग से बनाई गई हैं। पोम्पियो ने कहा कि ये बस्तियां वैध हैं या नहीं, यह तय करना इस्रायल की न्याय प्रणाली का काम है। पोम्पियो ने कहा- हमारी तरफ से यह इस बात की साधारण स्वीकारोक्ति है कि यह इस्रायल का हिस्सा है। यह हकीकत को स्वीकार करना है।


लेकिन अमेरिकी मीडिया के मुताबिक पोम्पियो की इस यात्रा से अमेरिकी विदेश मंत्रालय के अधिकारी चिंतित हैं। उन्होंने कहा कि वहां जाने का फैसला पूरी तरह पोम्पियो ने खुद लिया। विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने इसका सुझाव नहीं दिया था। गौरतलब है कि पोम्पियो ने ये यात्रा उस समय की है, जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चुनाव हार चुके हैं और उनका प्रशासन नैतिक रूप से कार्यवाहक हैसियत में है। परंपरा यह है कि ऐसे हालात में यानी पराजित प्रशासन अहम नीतिगत फैसले नहीं लेता है।
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इस यात्रा से आगामी जो बाइडन प्रशासन के लिए मुश्किलें खड़ी होंगी। जो बाइडन अगले 20 जनवरी को राष्ट्रपति का पद संभालेंगे। ट्रंप ने अभी तक अपनी हार स्वीकार नहीं की है, वे बार-बार दावा कर रहे हैं कि 3 नवंबर को हुए राष्ट्रपति चुनाव में उनकी ही जीत हुई है।

पोम्पियो भी यह कह चुके हैं कि आगामी 20 जनवरी को “दूसरे ट्रंप प्रशासन के हाथ में सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण होगा।” इससे अमेरिका में एक बड़ी अजीब सी और अभूतपूर्व स्थिति पैदा हो गई है। इसी बीच ट्रंप प्रशासन और उसके मंत्री लगातार बड़े नीतिगत और प्रशासनिक फैसले ले रहे हैं।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि पोम्पियो की निगाह 2024 में रिपब्लिकन पार्टी की तरफ से राष्ट्रपति चुनाव लड़ने पर है। इसलिए वे अमेरिका के कट्टरपंथी समूहों में अपनी पैठ बनाना चाहते हैं। अमेरिका के कट्टरपंथी ईसाई और यहूदी समूह इस्रायल का अंध समर्थन करते हैं। गुरुवार को पोम्पियो की यात्रा के बाद एक कट्टरपंथी संगठन के नेता ईसाई बॉब वैंडर लैट्स ने कहा कि उनकी इस यात्रा से इस्रायल के प्रति ट्रंप प्रशासन की प्रतिबद्धता का सबूत मिला है। पोम्पियो ने अब बाइडन-हैरिस प्रशासन के लिए बहुत ऊंची कटौती तय कर दी है।

बाइडन इस्रायल-फिलस्तीन विवाद में दो-राष्ट्र के सिद्धांत की वकालत करते हैं। इसका मतलब है कि इस्रायल और फिलस्तीन दोनों स्वतंत्र देश के रूप में रहें। डेमोक्रेटिक पार्टी की नीति यह है कि दो-राष्ट्र के सिद्धांत को संभव बनाने के लिए इस्रायल को उन इलाकों को खाली कर देना चाहिए जिन पर उसने 1967 के युद्ध के बाद कब्जा किया है। जबकि इस्रायल उन इलाकों पर बस्तियां बसाता गया है। अमेरिका ने अब तक इसे मान्यता नहीं दी थी। लेकिन पोम्पियो ने ये वर्जना तोड़ दी है।

पोम्पियो की यात्रा पर फिलस्तीनी गुटों में तीव्र आक्रोश देखा गया। बुधवार को सगोट के कुछ फिलीस्तीनी बाशिंदो ने प्रदर्शन किया था, जिसमें पोम्पियो गो बैक और पोम्पियो युद्ध अपराधियों का दोस्त है, जैसे नारे लगाए गए। सीरिया ने भी इस यात्रा की आलोचना की है। इस्रायल ने 1967 के युद्ध में गोलान पहाड़ियों को सीरिया से छीना था। वो क्षेत्र भी विवादास्पद है। पोम्पियो उस इलाके में नहीं गए। लेकिन सीरिया ने कहा है कि उसके जो इलाके इस्रायल के कब्जे में हैं, उन्हें तुरंत वापस किया जाना चाहिए।

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