अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। तीन नवंबर को हुए मतदान के नतीजों में डेमोक्रेटिक पार्टी ने अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों- सीनेट और प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) पर नियंत्रण हासिल कर लिया। इसके साथ ही ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के पहले दो वर्षों में चला आ रहा रिपब्लिकन पार्टी का संसद पर नियंत्रण खत्म हो गया है।
यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण था, क्योंकि ट्रंप ने 2024 में राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद रिपब्लिकन पार्टी के लिए संसद के दोनों सदनों में बहुमत हासिल किया था। इस तरह राष्ट्रपति पद के साथ कांग्रेस पर भी उनकी पार्टी का नियंत्रण था। अब मध्यावधि चुनाव के नतीजों ने यह स्थिति बदल दी है।
सीनेट में सात सीटों का नुकसान
चुनाव से पहले रिपब्लिकन के पास सीनेट की 53 सीटें थीं, जबकि डेमोक्रेट्स के पास 45 और उनके साथ खड़े दो निर्दलीय सदस्यों का समर्थन था। इस बार डेमोक्रेट्स ने रिपब्लिकन से सात सीटें छीन लीं। शुरुआती घोषित नतीजों में डेमोक्रेटिक खेमे को 54 और रिपब्लिकन को 44 सीटें मिली थीं। यहां डेमोक्रेटिक खेमे में दो निर्दलीय सदस्य भी शामिल हैं। सीनेट में कुल 100 सदस्य होते हैं और बहुमत के लिए 51 सीटों की जरूरत होती है।
प्रतिनिधि सभा में भी डेमोक्रेट्स को बहुमत
हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की सभी 435 सीटों पर चुनाव हुआ। बहुमत के लिए 218 सीटें जरूरी हैं। डेमोक्रेट्स ने यह आंकड़ा पार कर लिया। शुरुआती आकलन में डेमोक्रेट्स को 228 और रिपब्लिकन को 139 सीटें मिलती दिखाई गईं हैं। कई सीटों पर मतगणना जारी है। इस सदन में जीत के साथ डेमोक्रेटिक नेता हकीम जेफ्रीज के जनवरी 2027 में स्पीकर बनने का रास्ता साफ हो गया है। वह इस पद पर पहुंचने वाले पहले अश्वेत नेता हो सकते हैं। इस बदलाव का सीधा असर ट्रंप के बाकी कार्यकाल पर पड़ेगा। अब उन्हें कानून बनाने, बजट पारित कराने और कई प्रशासनिक फैसलों को आगे बढ़ाने के लिए डेमोक्रेट्स के विरोध का सामना करना होगा।
टेक्सास से मेन तक सात राज्यों में रिपब्लिकन को झटका, किसने किसे हराया?
सीनेट चुनाव में डेमोक्रेट्स की जीत का सबसे अहम पहलू उन राज्यों में मिली सफलता रही, जिन्हें लंबे समय से रिपब्लिकन पार्टी का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। सात राज्यों में रिपब्लिकन उम्मीदवारों को हराकर डेमोक्रेट्स ने सीनेट का पूरा चुनावी गणित बदल दिया।
1. टेक्सास: डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जेम्स टालारिको ने रिपब्लिकन केन पैक्सटन को हराया। टेक्सास में 1988 के बाद पहली बार डेमोक्रेटिक पार्टी का उम्मीदवार सीनेट चुनाव जीतने में सफल रहा। पैक्सटन राज्य के अटॉर्नी जनरल रह चुके हैं और ट्रंप के समर्थित नेताओं में गिने जाते थे। चुनाव में उनकी उम्मीदवारी को लेकर रिपब्लिकन पार्टी के अंदर भी मतभेद थे।
2. कंसास: डेमोक्रेटिक उम्मीदवार एडम हैमिल्टन ने रिपब्लिकन सीनेटर रोजर मार्शल को हराया। कंसास ने 1932 के बाद पहली बार किसी डेमोक्रेटिक उम्मीदवार को सीनेट भेजा है। करीब 94 साल बाद हुए इस बदलाव को चुनाव के सबसे बड़े उलटफेरों में गिना जा रहा है। हैमिल्टन एक पादरी हैं और देश के बड़े मेथोडिस्ट चर्च से जुड़े रहे हैं।
3. आयोवा: डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जोश ट्यूरेक ने रिपब्लिकन एश्ले हिंसन को हराया। यह सीट भी पहले रिपब्लिकन के पास थी। ट्यूरेक की जीत इसलिए महत्वपूर्ण रही, क्योंकि 2024 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप ने इस राज्य में अच्छी बढ़त हासिल की थी।
4. नॉर्थ कैरोलिना: डेमोक्रेटिक उम्मीदवार रॉय कूपर ने रिपब्लिकन माइकल व्हाटली को हराया। कूपर राज्य के पूर्व गवर्नर हैं। उनकी जीत से डेमोक्रेट्स ने एक और रिपब्लिकन सीट अपने खाते में जोड़ ली।
5. ओहायो: डेमोक्रेटिक नेता शेरॉड ब्राउन ने रिपब्लिकन जॉन हस्टेड को हराकर सीनेट में वापसी की। ब्राउन पहले भी सीनेटर रह चुके हैं। यह मुकाबला खास था, क्योंकि ओहायो में ट्रंप के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस का राजनीतिक प्रभाव माना जाता है।
6. मेन: डेमोक्रेटिक उम्मीदवार ट्रॉय जैक्सन ने रिपब्लिकन सीनेटर सुसान कॉलिन्स को हराया। कॉलिन्स पांच बार सीनेटर रह चुकी थीं और पार्टी की वरिष्ठ नेताओं में शामिल थीं। उनकी हार को रिपब्लिकन पार्टी के लिए बड़े झटके के तौर पर देखा गया।
7. दक्षिण कैरोलिना: डेमोक्रेटिक उम्मीदवार एनी एंड्रयूज ने रिपब्लिकन उम्मीदवार डार्लिन ग्राहम को हराया। डार्लिन, दिवंगत सीनेटर लिंडसे ग्राहम की बहन हैं। जुलाई में लिंडसे ग्राहम की मृत्यु के बाद उन्हें इस सीट पर नियुक्त किया गया था। ट्रंप ने भी उनका समर्थन किया था। इसके बावजूद डेमोक्रेट्स ने यह सीट जीत ली। इनके अलावा जॉर्जिया में डेमोक्रेटिक सीनेटर जॉन ओसॉफ ने अपनी सीट बरकरार रखी। न्यू हैम्पशायर में क्रिस पप्पास ने भी जीत दर्ज की।
हाउस चुनाव में भी डेमोक्रेट्स की बड़ी वापसी, इन सीटों पर बदला समीकरण
प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत सिर्फ बहुमत हासिल करने तक सीमित नहीं रही। पार्टी ने कई ऐसे चुनावी क्षेत्रों में रिपब्लिकन उम्मीदवारों को हराया, जहां पहले मुकाबला कड़ा माना जा रहा था। कुछ राज्यों में पार्टी ने लंबे समय से रिपब्लिकन के पास रही सीटें भी छीन लीं।
न्यू जर्सी की सातवीं सीट से डेमोक्रेटिक उम्मीदवार रेबेका बेनेट ने रिपब्लिकन सांसद टॉम कीन जूनियर को हराया। पेंसिल्वेनिया की सातवीं सीट पर बॉब ब्रूक्स ने रिपब्लिकन रयान मैकेंजी को शिकस्त दी। इसी राज्य की आठवीं सीट से पैगे कोगनेटी और दसवीं सीट से जेनेल स्टेलसन ने भी जीत हासिल की। केंटकी की छठी सीट से जैक डेम्बो ने रिपब्लिकन उम्मीदवार राल्फ अल्वाराडो को हराया। विस्कॉन्सिन की पहली सीट से मिशेल बर्मन और तीसरी सीट से रेबेका कुक ने रिपब्लिकन उम्मीदवारों को हराकर डेमोक्रेट्स की झोली में सीटें डालीं।
आयोवा की तीसरी सीट से सारा ट्रोन गैरीट, नॉर्थ कैरोलिना की 11वीं सीट से जेमी एगर और कोलोराडो की आठवीं सीट से मैनी रुटिनेल ने भी जीत दर्ज की। कैलिफोर्निया की पहली सीट से माइक मैकगायर और वर्जीनिया की दूसरी सीट से एलेन लुरिया ने भी डेमोक्रेटिक पार्टी के खाते में जीत जोड़ी। अलबामा की दूसरी सीट से डेमोक्रेटिक उम्मीदवार शोमारी फिगर्स की जीत भी चर्चा में रही। यह उन सीटों में शामिल थी, जहां डेमोक्रेट्स ने अपनी स्थिति मजबूत की।
गवर्नर चुनाव में भी चार राज्यों में सत्ता परिवर्तन
अमेरिका में मध्यावधि चुनाव के दौरान 36 राज्यों में गवर्नर पद के लिए भी मतदान हुआ। यहां भी डेमोक्रेटिक पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया। जॉर्जिया, आयोवा, ओहायो और टेक्सास में रिपब्लिकन के कब्जे वाली गवर्नर सीटें डेमोक्रेट्स ने छीन लीं।
जॉर्जिया: डेमोक्रेटिक उम्मीदवार कीशा लांस बॉटम्स ने रिपब्लिकन रिक जैक्सन को हराया। वह जॉर्जिया की पहली अश्वेत महिला गवर्नर होंगी। इस जीत के साथ उन्होंने अमेरिकी राजनीति में एक नया इतिहास बनाया है।
ओहायो: डेमोक्रेटिक उम्मीदवार एमी एक्टन ने विवेक रामास्वामी को हराकर गवर्नर चुनाव जीत लिया। वह ओहायो की पहली महिला गवर्नर होंगी। इस राज्य में 20 साल बाद किसी डेमोक्रेटिक उम्मीदवार ने गवर्नर पद का चुनाव जीता है।
आयोवा: डेमोक्रेटिक उम्मीदवार रॉब सैंड ने रिपब्लिकन जैक लान को हराया। इस जीत के साथ आयोवा में भी रिपब्लिकन पार्टी का नियंत्रण खत्म हो गया।
टेक्सास: डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जीना हिनोजोसा ने मौजूदा रिपब्लिकन गवर्नर ग्रेग एबॉट को हराकर सबसे बड़ा उलटफेर किया। वह टेक्सास की पहली लैटिना गवर्नर होंगी। टेक्सास में लंबे समय से रिपब्लिकन पार्टी का दबदबा रहा है। 1990 के दशक के बाद पहली बार कोई डेमोक्रेटिक नेता यहां गवर्नर बनने जा रहा है।
इन नतीजों के साथ डेमोक्रेट्स ने राज्य सरकारों में भी अपनी स्थिति मजबूत की। कैलिफोर्निया, न्यूयॉर्क, पेंसिल्वेनिया, मैरीलैंड और इलिनॉय जैसे राज्यों में पार्टी ने अपनी सत्ता बरकरार रखी।
भारतीय मूल के उम्मीदवारों में किसने मारी बाजी, कौन रह गया पीछे?
अमेरिकी चुनाव में भारतीय मूल के उम्मीदवारों का प्रदर्शन भी चर्चा में रहा। इस बार कांग्रेस, राज्य सरकारों और स्थानीय चुनावों में भारतीय मूल के कई उम्मीदवार मैदान में थे। इंडो-अमेरिकन न्यूज सर्विस के आंकड़ों का हवाला देते हुए आई रिपोर्टों के मुताबिक, अलग-अलग पदों के लिए कम से कम 57 भारतीय मूल के उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे थे। इनमें डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन दोनों दलों के नेता शामिल थे।
पिया दांडिया: फ्लोरिडा की 22वीं कांग्रेसनल सीट से डेमोक्रेटिक उम्मीदवार पिया दांडिया ने रिपब्लिकन उम्मीदवार केसी अस्कर को हराया। वह पेशे से स्कूल की पूर्व प्रिंसिपल रही हैं। उनकी जीत के साथ भारतीय मूल की एक और महिला अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में पहुंचेंगी।
सुहास सुब्रमण्यम: वर्जीनिया की 10वीं कांग्रेसनल सीट से डेमोक्रेटिक सांसद सुहास सुब्रमण्यम ने दोबारा जीत दर्ज की। उन्होंने रिपब्लिकन उम्मीदवार डेव बेकविथ को हराया। सुब्रमण्यम 2024 में वर्जीनिया से अमेरिकी कांग्रेस पहुंचने वाले पहले भारतीय मूल के अमेरिकी बने थे।
अरुणा मिलर: मैरीलैंड की लेफ्टिनेंट गवर्नर अरुणा मिलर ने दोबारा जीत हासिल की। वह डेमोक्रेटिक गवर्नर वेस मूर के साथ चुनाव मैदान में थीं। दोनों ने रिपब्लिकन उम्मीदवारों को हराकर अपना पद बरकरार रखा।
रो खन्ना: कैलिफोर्निया की 17वीं सीट से डेमोक्रेटिक सांसद रो खन्ना भी दोबारा चुनाव लड़ रहे थे। शुरुआती रिपोर्टों में उनकी सीट पर मतगणना जारी थी। बाद की रिपोर्टों में उनकी जीत की पुष्टि की गई।
अमी बेरा: कैलिफोर्निया की तीसरी सीट से डेमोक्रेटिक सांसद अमी बेरा आठवीं बार चुनाव मैदान में थे। शुरुआती मतगणना में वह आगे चल रहे थे। उनकी सीट का परिणाम भी शुरुआती रिपोर्टिंग में लंबित था।
प्रमिला जयपाल: वाशिंगटन राज्य की सातवीं सीट से डेमोक्रेटिक सांसद प्रमिला जयपाल भी दोबारा चुनाव लड़ रही थीं। बाद की रिपोर्टों में उनकी जीत का उल्लेख किया गया।
विवेक रामास्वामी: रिपब्लिकन नेता विवेक रामास्वामी ओहायो के गवर्नर पद के उम्मीदवार थे। उन्हें राष्ट्रपति ट्रंप का समर्थन हासिल था। लेकिन डेमोक्रेटिक उम्मीदवार एमी एक्टन ने उन्हें हरा दिया। यह भारतीय मूल के रिपब्लिकन नेताओं के लिए चुनाव की सबसे चर्चित हारों में से एक रही।
सरिता कोमाटिरेड्डी: न्यूयॉर्क के अटॉर्नी जनरल पद के चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवार सरिता कोमाटिरेड्डी को मौजूदा डेमोक्रेटिक अटॉर्नी जनरल लेटिशिया जेम्स ने हराया। उन्होंने अपनी हार स्वीकार कर ली।
शिवा अय्यादुरई: मैसाचुसेट्स से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर सीनेट चुनाव लड़ रहे शिवा अय्यादुरई को भी हार का सामना करना पड़ा। मौजूदा सीनेटर एड मार्की अपनी सीट बचाने में सफल रहे।
इस तरह भारतीय मूल के उम्मीदवारों में डेमोक्रेटिक पार्टी के कई नेताओं ने जीत हासिल की, जबकि विवेक रामास्वामी और सरिता कोमाटिरेड्डी जैसे रिपब्लिकन चेहरों को हार मिली।
अब्दुल अल-सैयद: डेमोक्रेट अब्दुल अल-सैयद ने मिशिगन में अमेरिकी सीनेट सीट की दौड़ में रिपब्लिकन माइक रोजर्स को हरा दिया है। यह जीत पूर्व जन स्वास्थ्य अधिकारी के लिए एक बड़ी उपलब्धि है, जिन्होंने डॉक्टर के रूप में प्रशिक्षण लेने के बाद राजनीति में कदम रखा था।
इस जीत के साथ, अल-सैयद अमेरिकी सीनेट के लिए चुने जाने वाले पहले मुस्लिम बनकर इतिहास रच दिया है।अल-सैयद ने 'यूनिवर्सल हेल्थकेयर' (सभी के लिए स्वास्थ्य सेवा) और सरकारी जवाबदेही पर केंद्रित एजेंडे के साथ चुनाव प्रचार किया था। उन्होंने देश के प्रमुख राजनीतिक अखाड़ों में से एक में हुए इस कड़े मुकाबले में जीत हासिल की है।
ईरान युद्ध ने बढ़ाई मुश्किल, महंगाई और पेट्रोल की कीमतों से नाराज थे मतदाता
रिपब्लिकन पार्टी की हार के पीछे सबसे बड़ी वजहों में ईरान युद्ध और उससे पैदा हुई आर्थिक परेशानियों को गिना जा रहा है। ट्रंप प्रशासन की ईरान नीति और सैन्य अभियान का असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर पड़ा। ऊर्जा बाजार में अस्थिरता, ईंधन की बढ़ती कीमतें और रोजमर्रा की जरूरतों का महंगा होना मतदाताओं की नाराजगी का बड़ा कारण बना।
रॉयटर्स के मुताबिक, चुनाव से जुड़े एग्जिट पोल में करीब 10 में से नौ मतदाताओं ने जीवनयापन की बढ़ती लागत को अपने वोट के लिए अहम मुद्दा बताया। करीब दो-तिहाई मतदाताओं ने महंगाई के लिए ट्रंप को जिम्मेदार ठहराया। सर्वेक्षण में शामिल अधिकांश लोगों का मानना था कि ईरान युद्ध और दूसरे देशों से आयात होने वाले सामान पर लगाए गए टैरिफ ने उनकी आर्थिक स्थिति को और खराब किया है।
मतदाताओं के लिए पेट्रोल, खाद्य पदार्थ, घर का खर्च और स्वास्थ्य सेवाओं की कीमतें महत्वपूर्ण मुद्दे थीं। ट्रंप ने चुनाव से पहले महंगाई कम करने का वादा किया था, लेकिन मतदाताओं के एक बड़े हिस्से को लगा कि उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं हुआ है।
ईरान युद्ध पर भी असंतोष: रॉयटर्स-इप्सोस के चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में 55 प्रतिशत मतदाताओं ने कहा कि ईरान के साथ युद्ध की कीमत अमेरिका के लिए उचित नहीं है। केवल 25 प्रतिशत लोगों ने सैन्य कार्रवाई को सही ठहराया। इस मुद्दे ने ट्रंप की विदेश नीति को भी चुनावी बहस के केंद्र में ला दिया।
टैरिफ का असर: ट्रंप ने दूसरे देशों से आने वाले सामान पर आयात शुल्क बढ़ाने की नीति अपनाई थी। उनके प्रशासन का तर्क था कि इससे अमेरिकी उद्योगों को फायदा होगा और घरेलू उत्पादन बढ़ेगा। लेकिन आलोचकों का कहना था कि आयात शुल्क का बोझ अंतत: अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ता है। चुनाव में महंगे सामान की शिकायतों ने इस नीति को भी चर्चा में ला दिया।
भ्रष्टाचार और सरकार की दिशा: मतदाताओं में सरकारी भ्रष्टाचार को लेकर भी चिंता थी। करीब तीन-चौथाई मतदाताओं ने देश की मौजूदा दिशा पर असंतोष या नाराजगी जताई। करीब सात में से दस मतदाताओं ने कहा कि कांग्रेस को राष्ट्रपति की शक्तियों पर ज्यादा निगरानी रखनी चाहिए।
ट्रंप का कम होता समर्थन, एग्जिट पोल में 38 प्रतिशत रही स्वीकृति दर
चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की हार का एक अहम पहलू राष्ट्रपति ट्रंप की लोकप्रियता में गिरावट भी रही। सीबीएस न्यूज के एग्जिट पोल के शुरुआती आंकड़ों में ट्रंप की स्वीकृति दर 38 प्रतिशत बताई गई। यह उनके पहले कार्यकाल के मध्यावधि चुनाव के समय के मुकाबले भी कम थी।
करीब छह में से दस मतदाताओं ने कहा कि प्रतिनिधि सभा के लिए वोट देते समय ट्रंप उनके फैसले का एक कारक थे। डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को वोट देने वाले मतदाताओं में ट्रंप के विरोध का रुख अधिक स्पष्ट था। वहीं, रिपब्लिकन उम्मीदवारों को वोट देने वाले सभी मतदाताओं के लिए ट्रंप का समर्थन एक जैसा महत्वपूर्ण नहीं था।
चुनाव से पहले ट्रंप ने अपने उम्मीदवारों के समर्थन में कई रैलियां कीं। उन्होंने समर्थकों से अपील की कि वे ऐसे वोट करें जैसे वह खुद चुनाव लड़ रहे हों। लेकिन नतीजों से साफ हुआ कि राष्ट्रपति का प्रचार भी कई राज्यों में रिपब्लिकन उम्मीदवारों को जीत नहीं दिला सका। युवा मतदाताओं और लैटिन अमेरिकी मूल के मतदाताओं के बीच भी रिपब्लिकन पार्टी के समर्थन में गिरावट की खबरें आईं। 2024 में ट्रंप को इन वर्गों से अपेक्षाकृत बेहतर समर्थन मिला था। इस बार महंगाई और जीवनयापन की लागत के सवाल पर उनका एक हिस्सा डेमोक्रेट्स की ओर गया।
कमजोर उम्मीदवार, गलत चुनावी रणनीति और अतिआत्मविश्वास भी पड़ा भारी
रिपब्लिकन पार्टी की हार का विश्लेषण केवल ईरान युद्ध और महंगाई तक सीमित नहीं है। कई राज्यों में उम्मीदवारों का चयन, पार्टी के भीतर मतभेद और ट्रंप के समर्थन पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता भी चुनावी नतीजों को प्रभावित करने वाले कारक रहे।
टेक्सास में केन पैक्सटन की उम्मीदवारी को लेकर रिपब्लिकन पार्टी के भीतर सवाल उठे थे। पैक्सटन का नाम कई विवादों से जुड़ा रहा है। इसके बावजूद ट्रंप ने उनका समर्थन किया। दूसरी तरफ डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जेम्स टालारिको ने महंगाई, भ्रष्टाचार और आम लोगों की आर्थिक परेशानी को चुनाव का मुख्य मुद्दा बनाया। आखिरकार पैक्सटन को हार मिली। दक्षिण कैरोलिना में डार्लिन ग्राहम को ट्रंप का समर्थन हासिल था। इसके बावजूद एनी एंड्रयूज ने उन्हें हरा दिया। मेन में सुसान कॉलिन्स की हार ने भी रिपब्लिकन पार्टी को झटका दिया। वह अनुभवी नेता थीं और पहले कई बार चुनाव जीत चुकी थीं।
ओहायो में विवेक रामास्वामी की हार भी इसी कड़ी में रही। ट्रंप के करीबी होने और पार्टी के बड़े नेताओं के समर्थन के बावजूद वह एमी एक्टन को नहीं हरा सके। इन नतीजों ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या रिपब्लिकन पार्टी ने स्थानीय मुद्दों और उम्मीदवारों की स्वीकार्यता की तुलना में राष्ट्रपति के समर्थन को ज्यादा महत्व दिया। इसके अलावा रिपब्लिकन पार्टी ने कई राज्यों में चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं में बदलाव कर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश की थी। डेमोक्रेट्स ने भी कैलिफोर्निया जैसे राज्यों में इसका जवाब दिया। इसके बावजूद डेमोक्रेट्स ने कई चुनौतीपूर्ण सीटों पर जीत हासिल की।
क्या 2028 के राष्ट्रपति चुनाव पर भी पड़ेगा असर?
दोनों सदनों में बहुमत गंवाने के बाद ट्रंप के लिए बाकी कार्यकाल में अपनी नीतियों को लागू करना आसान नहीं होगा। अमेरिका में कानून बनाने, सरकारी बजट पास करने और कई अहम नियुक्तियों की मंजूरी के लिए कांग्रेस की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
कानूनों पर लगेगी विपक्ष की नजर: अब ट्रंप प्रशासन के प्रस्तावित कानूनों को प्रतिनिधि सभा और सीनेट में डेमोक्रेटिक बहुमत की चुनौती मिलेगी। विपक्ष किसी प्रस्ताव को रोक सकता है या उसमें बदलाव की मांग कर सकता है।
प्रशासन की जांच: प्रतिनिधि सभा की समितियों के जरिए सरकारी विभागों, अधिकारियों और प्रशासनिक फैसलों की जांच कराई जा सकती है। ट्रंप प्रशासन की नीतियों और खर्च पर सवाल उठाए जा सकते हैं।
नियुक्तियों पर असर: सीनेट में बहुमत होने से राष्ट्रपति की ओर से की जाने वाली कई अहम नियुक्तियों की पुष्टि प्रभावित हो सकती है। न्यायिक और प्रशासनिक पदों के लिए नामित लोगों को विपक्ष की जांच और सवालों का सामना करना पड़ेगा।
2028 की तैयारी: डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए यह जीत अगले राष्ट्रपति चुनाव से पहले अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने का मौका है। हकीम जेफ्रीज और अन्य राष्ट्रीय नेताओं की भूमिका बढ़ सकती है। वहीं रिपब्लिकन पार्टी में भी ट्रंप की चुनावी रणनीति और उम्मीदवारों के चयन को लेकर बहस तेज हो सकती है। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस समेत पार्टी के दूसरे नेताओं के लिए भी यह नतीजा राजनीतिक चुनौती के रूप में देखा जाएगा।
हालांकि, डेमोक्रेट्स के दोनों सदनों में बहुमत हासिल करने का मतलब यह नहीं है कि ट्रंप की राष्ट्रपति पद की शक्तियां खत्म हो गई हैं। वह राष्ट्रपति बने रहेंगे और अपने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल कर सकेंगे। लेकिन अब उन्हें कांग्रेस में ऐसे विपक्ष का सामना करना होगा, जिसके पास उनके फैसलों पर सवाल उठाने और विधायी एजेंडे को रोकने की ताकत होगी। नई कांग्रेस का कार्यकाल 3 जनवरी 2027 से शुरू होगा। इस तरह मध्यावधि चुनाव ने ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के अगले दो वर्षों के लिए अमेरिकी राजनीति की दिशा बदल दी है।
क्यों कराए जाते हैं अमेरिका में मध्यावधि चुनाव?
अमेरिका में राष्ट्रपति का कार्यकाल चार साल का होता है, लेकिन संसद के दोनों सदनों के चुनाव हर दो साल में होते हैं। राष्ट्रपति चुनाव के ठीक दो साल बाद होने वाले इन चुनावों को मध्यावधि चुनाव यानी मिडटर्म इलेक्शन कहा जाता है। इनमें प्रतिनिधि सभा की सभी 435 सीटों और सीनेट की करीब एक-तिहाई सीटों पर मतदान होता है। इसके अलावा कई राज्यों में गवर्नर और स्थानीय पदों के लिए भी चुनाव कराए जाते हैं। इन चुनावों का मकसद संसद में जनता के प्रतिनिधियों को चुनना और राष्ट्रपति की नीतियों व कामकाज पर जनता की राय जानना भी होता है। इस बार ये चुनाव इसलिए अहम रहे, क्योंकि इनके नतीजे तय करेंगे कि डोनाल्ड ट्रंप अपने कार्यकाल के बाकी दो साल में संसद का कितना समर्थन हासिल कर पाएंगे।