वाशिंगटन में 6 जनवरी 2021 के कैपिटल हिल दंगे से जुड़े हाई-प्रोफाइल मामलों की पैरवी करने वाले प्रमुख अभियोजक माइकल गॉर्डन ने सरकार के खिलाफ केस दायर किया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि उन्हें ट्रंप समर्थकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की सजा दी गई है। गॉर्डन ने कहा कि उन्हें जून में बिना किसी ठोस कारण के नौकरी से निकाल दिया गया, जबकि उनके प्रदर्शन की समीक्षा में उन्हें सर्वोच्च रेटिंग दी गई थी।
गॉर्डन का कहना है कि उनकी बर्खास्तगी सिर्फ इसलिए हुई क्योंकि उन्होंने कानून का पालन किया और ट्रंप समर्थकों के खिलाफ केस लड़ने में अहम भूमिका निभाई। वे उन पहले अफसरों में हैं जिन्होंने सरकार के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उनके साथ दो और पूर्व अधिकारी पैट्रीशिया हार्टमैन और जोसेफ टिर्रेल भी इस केस में याचिकाकर्ता हैं।
प्रमुख आरोपियों के केस लड़े
गॉर्डन ने अब तक 36 से ज्यादा दंगा आरोपियों के खिलाफ केस लड़े हैं, जिनमें नैन्सी पेलोसी के ऑफिस में पांव रखने वाला रिचर्ड बार्नेट और प्लास्टिक हैंडकफ लेकर सीनेट पहुंचने वाला एरिक मुनचेल शामिल हैं। उन्होंने जे6 प्रेइंग ग्रैंडमा के नाम से मशहूर रेबेका लावरेंज और रे एप्स जैसे विवादास्पद आरोपियों के केस भी हैंडल किए हैं।
ट्रंप प्रशासन पर गंभीर सवाल
गॉर्डन ने कहा कि ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद न्याय विभाग में कई लोगों को निकाला गया, लेकिन उन्हें इस उम्मीद थी कि उनका काम उन्हें बचा लेगा। मगर जब उन्हें भी निकाल दिया गया, तो उन्होंने चुप न रहने और कानूनी लड़ाई लड़ने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि अगर हम चुप रहे तो न्याय का मतलब वही होगा जो राष्ट्रपति कहे, न कि कानून।
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फायरिंग के पीछे कोई ठोस कारण नहीं
गॉर्डन को बर्खास्त करने की चिट्ठी में सिर्फ यूएस संविधान के अनुच्छेद-II का हवाला दिया गया, जिसमें राष्ट्रपति को नियुक्ति और बर्खास्तगी का अधिकार होता है। उन्होंने कहा कि जब वे एक 100 मिलियन डॉलर के फ्रॉड केस के ट्रायल की तैयारी कर रहे थे, तभी ऑफिस का एक एडमिनिस्ट्रेटर आया और उन्हें बर्खास्तगी की चिट्ठी पकड़ा दी।
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राजनीतिक हस्तक्षेप बनाम न्याय की स्वतंत्रता
इस मामले ने अमेरिका में न्यायपालिका की स्वतंत्रता और राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर बहस छेड़ दी है। गॉर्डन ने कहा कि वह अपने बच्चों को ऐसा देश नहीं देना चाहते जहां न्याय की परिभाषा सत्ता तय करे। प्रतिनिधि सभा की सदस्य कैथी कास्टर ने अटॉर्नी जनरल से गॉर्डन को फिर बहाल करने की मांग की है। गॉर्डन की लड़ाई अब सिर्फ नौकरी की नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की गरिमा और स्वतंत्रता को बचाने की है। उनका कहना है कि अगर ईमानदार अफसरों को सजा दी जाएगी, तो जनता की कानून पर से आस्था खत्म हो जाएगी।