दुनिया में सक्रिय करीब 80 प्रतिशत आइसब्रेकर फिनिश कंपनियों ने डिजाइन किए हैं, जबकि करीब 60 प्रतिशत का निर्माण फिनलैंड के शिपयार्ड में हुआ है। फिनलैंड इकलौता देश है जहां सर्दियों में सभी बंदरगाह जम सकते हैं। देश का 97 प्रतिशत आयात समुद्र के रास्ते होता है, इसलिए सर्द महीनों में आइसब्रेकर बंदरगाहों को खुला रखने व बड़े मालवाहक जहाजों के लिए रास्ता बनाते हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ग्रीनलैंड को लेकर बार-बार दिए गए बयानों के बीच, अमेरिका का ध्यान अब तेजी से आर्कटिक क्षेत्र पर केंद्रित होता दिख रहा है। इसी रणनीतिक सोच के तहत वाशिंगटन ने अत्याधुनिक आइसब्रेकर जहाजों की खरीद का फैसला किया है। इन जहाजों के लिए अमेरिका ने फिनलैंड का रुख किया है जिसे आइसब्रेकर तकनीक का निर्विवाद वैश्विक नेता माना जाता है।
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आइसब्रेकर तकनीक में फिनलैंड की स्थिति बेजोड़ है। दुनिया में सक्रिय करीब 80 प्रतिशत आइसब्रेकर फिनिश कंपनियों ने डिजाइन किए हैं, जबकि करीब 60 प्रतिशत का निर्माण फिनलैंड के शिपयार्ड में हुआ है। फिनलैंड इकलौता देश है जहां सर्दियों में सभी बंदरगाह जम सकते हैं। देश का 97 प्रतिशत आयात समुद्र के रास्ते होता है, इसलिए सर्द महीनों में आइसब्रेकर बंदरगाहों को खुला रखने व बड़े मालवाहक जहाजों के लिए रास्ता बनाते हैं। इसी विशेषज्ञता के चलते राष्ट्रपति ट्रंप ने अक्तूबर में अपनी आर्कटिक रणनीति की ओर संकेत किया था। उन्होंने कहा था कि अमेरिका यूएस कोस्ट गार्ड के लिए फिनलैंड से चार आइसब्रेकर खरीदेगा। इसके अलावा सात और जहाज अमेरिका में ही बनेंगे, पर डिजाइन व तकनीक फिनलैंड से लिया जाएगा।
बदलता आर्कटिक और बढ़ती प्रतिस्पर्धा
जलवायु परिवर्तन के चलते आर्कटिक महासागर पहले से अधिक नौगम्य (नेविगेबल सी रूट) होता जा रहा है, बशर्ते आइसब्रेकर रास्ता बनाएं। इससे एशिया व यूरोप के बीच नए व्यापार मार्ग खुल रहे हैं। बर्फ कम होने से आर्कटिक के नीचे मौजूद तेल व गैस भंडार तक पहुंच भी आसान हो रही है। इससे देशों में प्रतिस्पर्द्धा बढ़ रही है।
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रूस और चीन से तुलना में अमेरिका
अमेरिका का यह कदम रूस की बढ़त को देखते हुए भी अहम है। रूस के पास करीब 40 आइसब्रेकर हैं। इसके मुकाबले अमेरिका के पास केवल तीन सक्रिय आइसब्रेकर हैं। चीन के पास लगभग पांच ध्रुवीय क्षमता वाले जहाज हैं। हालांकि विशेषज्ञों के मुताबिक वे तकनीकी रूप से पूर्ण आइसब्रेकर नहीं हैं।
आइसब्रेकर और शक्ति प्रदर्शन
डेनमार्क इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज की शोधकर्ता लिन मोर्टेन्सगार्ड मानती हैं कि अमेरिका का आइसब्रेकर कार्यक्रम केवल व्यावहारिक जरूरत नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन का माध्यम भी है। उनके अनुसार चाहे किसी देश के पास कितने भी एयरक्राफ्ट कैरियर हों, वे केंद्रीय आर्कटिक महासागर में नहीं जा सकते। आइसब्रेकर ही ऐसे नौसैनिक पोत हैं जो यह संकेत देते हैं कि कोई देश आर्कटिक शक्ति है और उसके पास वहां काम करने की क्षमता है।