बातचीत में कौन-कौन से मुद्दे होंगे शामिल, सवाल
हालांकि अभी भी दोनों पक्षों के बीच बड़ी बहस यह है कि बातचीत में किन मुद्दों को शामिल किया जाए। एक तरफ ईरान चाहता है कि बातचीत केवल उसके न्यूक्लियर कार्यक्रम तक सीमित रहे। दूसरी ओर अमेरिका चाहता है कि इसमें ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्र में प्रॉक्सी फोर्सेज (अनुयायी लड़ाकू समूहों) का समर्थन भी शामिल हो। वैसे ईरान बार-बार कह चुका है कि अपनी सुरक्षा क्षमताओं पर कोई सीमा लगाना उसकी रेड लाइन है, यानी इसे वह किसी भी हालत में स्वीकार नहीं करेगा।
ईरान ने भी दिया कड़ा संदेश
ईरानी सेना प्रमुख अब्दोलरहीम मूसवी ने कहा कि देश ने अपने बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम को अपग्रेड करके अपनी ताकत बढ़ा ली है। उन्होंने कहा कि अब ईरान किसी भी खतरे का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है और उनकी नई सैन्य नीति रक्षा से बढ़कर हमलावर और असममित युद्ध की रणनीति पर आधारित है। मूसवी ने चेतावनी दी कि किसी भी दुश्मन की हरकत का क्रशिंग जवाब दिया जाएगा।
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इस्राइल भी बना रहा अमेरिका पर दबाव, समझिए क्यों?
इन सभी चिजों के बीच ध्यान देने वाली बात यह भी है कि इस्राइल के नेता भी अमेरिका पर दबाव डाल रहे हैं कि ईरान के इरादों पर संदेह बनाये रखें और किसी भी समझौते के लिए कड़े शर्तें तय करें। इससे बातचीत और जटिल हो जाती है। ऐसे में ये वार्ता पुराने अनुभवों के बीच हो रही है। 2015 में हुए जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (जेसीपीओए) समझौते से अमेरिका 2018 में बाहर निकल गया था। इसके बाद ईरान ने अत्यधिक शुद्धता वाले यूरेनियम का संवर्धन बढ़ा दिया है, जिसे लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंता बढ़ी है। इस समय विवाद का मुख्य मुद्दा यह है कि पहले की प्रगति को कैसे या क्या तरीके से वापस किया जाए।
ईरान में प्रदर्शन और अमेरिका का रुख, समझिए
गौरतलब है कि ईरान में हाल ही में हुए विरोध प्रदर्शनों पर सरकार के कड़े दमन और पश्चिमी देशों की आलोचना के बाद, अमेरिका ने कठिन रुख अपनाया है। इसमें पश्चिम एशिया में लंबे सैन्य अभ्यास और स्पष्ट धमकियां शामिल हैं। ईरानी अधिकारी चेतावनी देते हैं कि अगर अमेरिका हमला करता है, तो इसका जवाब कड़ा होगा और यह पूरे क्षेत्र में संघर्ष बढ़ा सकता है। इतना ही नहीं ईरान ने यह भी कहा है कि बातचीत में भाग लेने के लिए अमेरिकी प्रतिबंधों में राहत बेहद जरूरी है।
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