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US Election 2020: कैसा हो अमेरिका, आखिरी बहस में उभरा परस्पर विरोधी नजरिया

Fri, 23 Oct 2020 03:10 PM IST
Harendra Chaudhary वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन

सार

दशकों से नस्ल और महिला अधिकारों जैसे सामाजिक और सांस्कृतिक मामलों में रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टियों की सोच अलग रही है। लेकिन बहस से इस बात पर रोशनी पड़ी कि इस बार मतभेद आर्थिक और समाज कल्याण के मसलों पर भी चौड़े हो गए हैं...
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अमेरिका में प्रेसिडेंशियल डिबेट - फोटो : ANI (File)
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विस्तार
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और उनके प्रतिद्वंद्वी डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रत्याशी जो. बाइडेन के बीच तीसरी बहस इस रूप से में सार्थक रही कि इससे दोनों उम्मीदवारों का विज़न उभर कर सामने आ सका। इस पर रोशनी पड़ी कि अपने देश और दुनिया में उसकी भूमिका के बारे में दोनों की कल्पना बुनियादी रूप से अलग है।

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दशकों से नस्ल और महिला अधिकारों जैसे सामाजिक और सांस्कृतिक मामलों में रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टियों की सोच अलग रही है। लेकिन बहस से इस बात पर रोशनी पड़ी कि इस बार मतभेद आर्थिक और समाज कल्याण के मसलों पर भी चौड़े हो गए हैं। बहस के दौरान ट्रंप ने कहा कि अगर बाइडेन जीते, तो शेयर मार्केट धड़ाम हो जाएगा, जबकि वे जीते तो यह नई ऊंचाइयों पर पहुंचेगा।

इसके जवाब में बाइडेन ने कहा कि वे जहां से आते हैं, वहां वॉल स्ट्रीट (अमेरिकी शेयर मार्केट) से खुशहाली नहीं आती। इस तरह उन्होंने वॉल स्ट्रीट बनाम मेन स्ट्रीट (असली अर्थव्यवस्था) के बीच बढ़ते फर्क को रेखांकित करने की कोशिश की। ये संदेश दिया कि उनकी कोशिश वास्तविक अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने पर होगी, ताकि देश में रोजगार पैदा हो और आम मेहनतकश वर्ग की जिंदगी बेहतर हो सके।
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गौरतलब है कि राष्ट्रपति चुनाव से 11 दिन पहले राष्ट्रपति और रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनल्ड ट्रंप और डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार जो बाइडेन के बीच तीसरी बहस हुई। आखिरकार इसमें मुद्दों पर अपेक्षाकृत अधिक शांत माहौल में दोनों ने अपनी राय रखी। पहली बहस में दोनों के बीच इतनी टोकाटाकी हुई थी कि उससे कोई सार्थक बात सामने नहीं आ सकी। ट्रंप के कोरोना वायरस से संक्रमित होने और उनके ऑनलाइन बहस से इंकार कर देने के कारण दूसरी बहस हो ही नहीं पाई। इसलिए तीसरी बहस पर सबकी निगाहें थीं।

इस वक्त अमेरिका कोरोना वायरस का कहर झेल रहा है। वह दुनिया में सबसे बुरी तरह प्रभावित देश है। देश का एक बड़ा हिस्सा इसके लिए ट्रंप की कथित विज्ञान विरोधी सोच को दोषी मानता है। इस माहौल में ये लाजिमी था कि हेल्थ केयर का मुद्दा बहस पर छाया रहता। इस दौरान जिस बात ने ध्यान खींचा वह जो बाइडेन का यह कहना था कि अगर वे जीते तो ओबामा केयर को बाइडेन केयर में तब्दील करेंगे। इसे इस बात का संकेत माना गया है कि डेमोक्रेटिक पार्टी में बढ़ते वामपंथी खेमे के प्रभाव के कारण वे अब अधिक प्रगतिशील हेल्थ केयर सिस्टम का वादा कर रहे हैं।

डेमोक्रेटिक पार्टी में सोशलिस्ट नेता बर्नी सैंडर्स और उनके समर्थकों का असर बढ़ने के साफ संकेत हैं। सैंडर्स ने कहा है कि फिलहाल उनका ध्यान ट्रंप को हराने पर है, लेकिन चुनाव के बाद वे अपना अलग 100 दिन का एजेंडा जारी करेंगे। इसमें स्वास्थ्य, रोजगार, मजदूरी, जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर उन कदमों का ब्योरा होगा, जिन्हें उठाने की मांग वे करेंगे। अगर संभावित बाइडेन प्रशासन ने इस दिशा में पहल नहीं की, तो वे अमेरिकी जनता से सड़कों पर उतरने की अपील करेंगे।

तीसरी बहस के तुरंत बाद अमेरिकी मीडिया की प्रतिक्रिया रही कि इसमें ट्रंप ने अधिक प्रभावशाली प्रदर्शन किया। लेकिन ये संदेह भी जताया गया कि इसका ज्यादा लाभ शायद उन्हें ना मिले, क्योंकि अब तक ज्यादातर मतदाता अपना मन बना चुके हैं। मगर उन्होंने मन क्या बनाया है, इसको लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। खुद बर्नी सैंडर्स ने कहा कि जिन राज्यों से चुनाव का नतीजा तय होना है वहां ट्रंप का मजबूत समर्थन आधार कायम है।

उन्होंने कहा कि इस चुनाव में उससे कहीं ज्यादा कड़ा मुकाबला है, जितना मीडिया में बताया जा रहा है। दूसरे विश्लेषकों ने ध्यान दिलाया है कि चार साल पहले मुख्यधारा के मीडिया ने एक राय से हिलेरी क्लिंटन के जीतने की भविष्यवाणी कर दी थी। लेकिन नतीजा उलटा आया। ऐसा फिर हो सकता है।

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